बोझिल शाम से सुकूने रात – पुरानी जीन्स के संग !!

बोझिल शाम से सुकूने रात और पुरानी जीन्स का सफ़र कुछ इस तरह है की … रोज ही ये सफ़र शुरू होता और रोज ही हमें चलते इस तरह जब मन में कुछ सिकन सा और ऐसा लगता !
“वक्त ने किये क्या हँसी सितम, तुम रहे ना तुम हम रहे ना हम.. जाये हम कहाँ सूझता नही.. क्या तलाश है कुछ पता नहीं .. बुन रहे है ख्वाब दम बदम” इस तरह बोझिल मन होता तब कहीं रातों को कोई सुकूं देने आता !

आये तकते है आज खिड़की से निस्तब्ध पड़ती इस महानगर की रातों को, कुछ भी नया नहीं है आज भी ..या कल भी वैसा ही तो था। निढाल पड़े नींद भी अपनी बाट जोहता । वही लेम्पोस्ट और उसके नीचे लगी चमचमाती कारें; दिन भर के दौराने सफर से वो भी इर्द गिर्द पसरे सन्नाटे में इक दूसरे की पीछे इस रात की खामोशी के धुन में धुन को मिलाते हुए ! गलियाँ वैसी रोज पीली रोशनी में नहायी हुई; जहाँ ना जाने का निशां ही दिखता ना किसी की आने की आहट ही प्रतीत होती ! रोज के उसी पुनरावृति से मुँह मोड़ के वापस कमरे में खोये नींद की तलाश में या सुकूने रात की तलाश में ..

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शब्द भी तो विराम चाहते है कभी कभी ख़ामोशी में पर जाते ये। पुरानी जींस से नाता कुछ इस तरह है जैसे ये निरीह रातों से किसी सफ़र पर ले जाता है सुदूर कहीं .. दूर इस भीड़ भाड़ से.. निकल कर मन को सुकूने रात की वादियों में । भूले बिसरे गीत और रेडियो पर एक अनजाने से वक्ता की मधुर आवाज अपनी और खींचती ।

जैसे बीच में कोई धुन “मुसाफिर हूँ यारों ना घर है ना ठिकाना .. हमें चलते जाना है” और चलने लग जाते इक नए जहाँ में कदम अपने आप .. !

जिन्दगी कितनी बोझिल हो पर एक आवाज जो सब भुला दे । किसी रात पुरानी जींस से कुछ यादें …

जिन्दगी को उमीदों के चश्मे से देखिये कितनी खुबसूरत है ।। कोसिये मत इसको जी भर के जी लीजये पता नहीं कबतक का साथ हो या कितनी लंबी जिंदगानी ।। और उद्घोषक की ध्वनि एक नए नजरिये से जिन्दगी को देखने का जज्बा देती ।
” कोई होता जिसको अपना हम कह लेते यारों पास नहीं दूर ही होता कोई मेरा अपना ।। ”

गीत तो कई है लेकिन अंदाजे बयाँ कोई चुन दे मेरे इस रात के चंद लम्हों के लिए कुछ गीतें जो मेरे यादों से उसी तरह टकराये . .. वैसी ही कुछ धुनें जो जो मन सुनना चाहता ।

कुछ चुनिंदा नज्मों में से आज गुलज़ार के इक नज्म से रूबरू हुआ पुरानी जींस पर !

साँस लेना भी कैसी आदत है !
जीये जाना भी क्या रिवायत है !

कोई आहट नहीं बदन में कहीं,
कोई साया नहीं आँखों में,
पल गुजरते है ठहरे ठहरे से,
जीये जातें हैं .. जीये जातें हैं !

पाँव बेहिस्स है चलते चलते जाते है,
एक सफर है जो बहता रहता है !

कितने बरसों से, कितने सदियों से,
जीये जातें हैं .. जीये जातें हैं !


इसी तरह कई राते है .. कितनी बातें इन रातों से ।
कभी आनंद के गीतों से जिंदगी को संजीदा करते तो कभी किसी की याद में गमगीन कर देते है ! कभी दोस्ती, कभी रिश्ते, कभी प्यार कितनी यादों को जिंदा करती हर रोज पुरानी जींस और रूबरू होते हम खुद से रोज, बोझिल रात सुकूने रात हो जाती !

About Show
# तो पुरानी जींस को आप भी सुनिए [On Radio Mirchi 98.3 FM]- Sayema ke Saath – Monday to Friday 9pm to 12am (IST)
# Mobile / IPAD / LAPTOP से http://gaana.com/radio/purani-jeans
# Host – @Rjsayema

#SK .. IN Night & Pen ..

3 thoughts on “बोझिल शाम से सुकूने रात – पुरानी जीन्स के संग !!

  1. Pari M Shlok

    comment nahi ho raha iss par to …. बोझिल शाम से सुकूने रात – पुरानी जीन्स के संग !!

  2. निशांत यादव

    मेट्रो स्टेशन पे हवा का जोर का झोका आया , और मुझे पुरानी यादों में ले गया , शायद बहीं पुरानी जींस

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