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Up election poem sattire

यूपी का चुनाव-प्रचार

जनता की सेवा के लिए हो गया,
पिता पुत्र में भी तकरार,
ये है यूपी का चुनाव-प्रचार !

इधर के उधर गए,
और उधर के नजाने किधर गए,
मिल बैठे सब नदियों जैसे,
धूल गए पुराने कर्म और विचार,
ये है यूपी का चुनाव-प्रचार !

घी-तेल सब चुपड़े खायेंगे,
अब कोई क्यों करे व्यापार,
माटी छोड़ अब मंदिर महल बनेंगे,
अब राम जी का ही करेंगे ये बेड़ा पार,
ये है यूपी का चुनाव-प्रचार !

न कोई ऊँचा न कोई नीचा,
जपते रहे विधि के सरताज,
वोटर है अब भाई भाई,
घर में पड़ी वोट की मार,
ये है यूपी का चुनाव-प्रचार !

#SK

social media troll

बातें गाली गलौज की …..

सोशल मीडिया और गाली गलौज ….

बहुत अच्छा प्रश्न है ; व्यापक है ; समस्या है ! लेकिन रोज एक ही बात बोलना की गाली गलौज हो रहा , ये कौन लोग है , वो कौन लोग है ! बीजेपी कांग्रेस व्हाट्सप्प फेसबुक तू तू मैं मैं ! आखिर कब तक यही जुमला फेंकते रहेंगे ये कौन लोग है ये कौन लोग है – आखिर लोग तो निश्चित तौर पर मंगल ग्रह के नहीं होंगे जो किसी न्यूज़ पर गाली – गलौज करने आते होंगे ! गाली भी लेवल लेवल के है – पढ़े लिखे पत्रकार जब देश के प्रधानमंत्री को नसीहत देते की खुनी पंजा वाला आदमी आज अमरीका घूम रहा इत्यादि इत्यादि खैर ये तो बुद्धिजीवी वर्ग वाला गाली है इसका तो कोर्स होता है ये सर्टिफाइड टाइप की गाली इसको आपने आईफोन से ट्वीट किया होगा वजन होगा इसके उलट में कोई कार्बन और लावा से फ्लैट भाषा में गाली गलौज कर जाता है तो समस्या है होनी चाहिए ! इस विषय को आगे नहीं बढ़ाते , मूल बिंदु पर चलते। ….

संदर्भ पर आते है गाली गलौज का कोई समर्थन नहीं कर रहा ; हम समस्या के जड़ में नहीं जाते सोशल मीडिया का प्रादुर्भाव विगत ५ सालों में बढ़ा है ; मोबाइल और इंटरनेट भी क्रांति की तरह आया तो समस्या यहीं से शुरू होती विज्ञानं सृजनात्मक है तो विध्वंशक भी है, हथियार बना सेना इस्तेमाल करती अब समाज में कोई उसी हथियार से उपद्रव करता डराता धमकाता तो हमने क्या किया, हथियार पर निबंध लिखा , नहीं ! हमने कानून बनाये, लोगों को जागरूक किया, स्कूल से कॉलेज में उस संविधान के बारे में बताया की सामाजिक उपद्रव अपराध है !

आइए चलते है इंटरनेट विहीन समाज की ओर ये कहीं भी हो सकता पटना बनारस दिल्ली कहीं भी ; क्या आपको गली के मुहाने पर बैठे लड़कियों पर सीटी बजाते लड़के नहीं दिखे, क्या कॉलेज के गेट पर बाइक चमकाते लड़के नहीं दिखे, आप पर फब्ती कसते लोग नहीं मिले, स्कूल में आपके प्रश्न पूछने पर अभद्र भाषा में बोलने वाले लड़के पिछली बेंच पर तो जरूर ही मिलें होंगे जो कहते होंगे “साला बड़ा आया पढ़ने वाला” सड़क पर ओवरटेक करने पर पीछे से आवाज तो जरूर आई होगी “बाप का सड़क समझता है **** “. ; ये समाज का एक तत्व है , एक हिस्सा है जिसके दिमाग में ये अभद्रता पलता है ! और इन्ही सब किसी बात के बढ़ने पर हम उस लड़के के पिताजी के पास, या स्कूल के हेडमास्टर के पास, या रोड पर बाता-बाती पर पुलिस के पास जाते या गए होंगे ! इसका मतलब एक उपाय है कानून है व्वयस्था है इस अभद्रता के खिलाफ ! शिक्षा बढ़ी जागरूकता बढ़ी और कमोबेश ही सही समाज में सुधार हुआ !

अब उसी समाज उसी तत्व उन्ही लोगों को एक 3जी सिम, एक मोबाइल या लैपटॉप, वाय-फाय राऊटर से जोड़ देते, एक नया आयाम खुल गया पहले तो सामने मोहल्ले के लोग थे टिप्पणी करने के लिए अब तो कश्मीर से कन्याकुमारी तक संसद से लेके विधान सभा तक न्यूज़ से लेके सिनेमा तक खेल से लेके खिलाड़ी तक, ये समस्या क्या बीजेपी कांग्रेस तक है ? ट्रोल तो हर चीज में पनपता जा रहा !

समस्या वहीँ है हमने इस समाज को इंटरनेट का झुनझुना तो पकड़ा दिया पर बजाए कैसे, कब , कितना , क्यों , कहाँ ये नहीं बताया न सिखाया ! क्या स्कूल से कॉलेज तक कोई पाठ्यक्रम शामिल हुआ नागरिक शास्त्र की किताबों का संसोधन हुआ जहाँ सड़क के नियम के साथ मोबाइल चलाने और गाली देने न देने की कुछ नियम हो ! समस्या लोग नहीं व्वयस्था है ; और इसी व्वयस्था की खामी का कोई राजनैतिक उपयोग-दुरूपयोग अपने अपने गणित के हिसाब से इस इक्वल टू बटा जीरो कर रहे !

अगर बुद्धिजीवी मानते गाली गलौज पर रोज दू चार हजार वर्ड का आर्टिकल लिख सकते तो इसके निदान पर क्यों नहीं , क्यों नहीं सब मिले के एक मसौदा बनाए सोशल मीडिया के उपयोग , इसके प्रबंधन, इसके नियम कानून परिभाषित हो, इसके दुरूपयोग की सीमा , सोशल मीडिया को जागरूकता का विषय बनाना, सोशल मीडिया नीति आयोग भी बना डालिए, सोशल मीडिया को पाठ्यक्रम में शामिल करना, सोशल मीडिया मॉनिटरिंग क्यों न हो जो उपद्रवी कंटेंट को रोके, सोशल मीडिया और राजनैतिक उपयोग पर विधान क्यों न बने, सोशल मीडिया पर्सनल और प्रोफेशनल लाइफ में मीडिया या कोई अन्य संस्था कैसे उपयोग करें इस पर क्यों नहीं कोई पहल हो !

इस पर भी मीडिया मार्च निकाल कर सरकार और संसद तक जा सकती ; एक मोमबत्ती इंडिया गेट पर इसी गाली गलौज के नाम ही सही या मुन्ना भाई के तरह बापू के राह पर गाली गलौज वालों को गेट वेल सून भी कहा जा सकता ! वो बीमार है उनके अच्छे होने की कामना तो कर ही सकते !

लेखक सोशल मीडिया एक्सपर्ट है (निजी राय ) – सुजीत कुमार

आईये एक मुहीम अपनाते
” सोशल मीडिया पर जो लोग गाली गलौज करते वो बीमार है ! उन्हें गेट वेल सून कहिये ! “

#ThankYouSachin

देखते होंगे क्रिकेट पहले भी लोग, लेकिन साँसें रोक के, चाय की दुकान पर, मन में भगवान को याद करके, दोस्तों के कंधे पर हाथ रख के, पिताजी के साथ सोफे पर बैठ करके, टीवी की दुकान के बाहर भीड़ में शामिल हो, हॉस्टल में टीवी का जुगाड़ करके, बिजली कटने पर बेशर्म हो पड़ोसी के यहाँ जाके, राह चलते कान में रेडियो सटाके, आते जाते स्कोर क्या है पूछ्के नजाने किस किस तरीके से क्रिकेट देखने के इस नये नजरिया का नाम था “सचिन”. इस खिलाडी ने पुरे देश को एक साथ आके क्रिकेट देखना सिखाया, आँखों में जीत के सपने को तैरना सिखाया, ख़ुशी पर एक साथ सब भूल के झूमना सिखाया ! हार की मायूसी में गमगीन होना भी सिखाया ; सचिन आला रे पर कदमों को थिरकना सिखाया !

सचिन क्या था ~ किसी के रूम के दीवारों पर क्रिकेट सम्राट से निकाला गया पोस्टर, या किसी के सिरहाने में अख़बार से काट कर रखे गए हजारों तस्वीर का गुच्छा, या सचिन के बाल-बाल आउट होने से बचने पर धक से रह जाता सीना, सचिन के आउट होने पर रोने सी शक्ल का हो जाना, या सचिन के गलत आउट दिए जाने पर गुस्से से भर जाना ! आखिर सचिन क्या था ! कैसे कोई खेलते खेलते आँखों में बस जाता झुक के फ्लिप, आगे बढ़ के ड्राइव, हुक करके छक्का, नजाकत का स्टेट ड्राइव, छेड़ने जैसे अपर कट, जैसे सब कुछ एक वक़्त के लम्हें कर तरह मन में कैद हो ! जैसे सबने सचिन के साथ दो दशक को जिया है !

सचिन के खेल ने जीवन जीना सीखा दिया, अच्छी गेंदबाजी पर ५ गेंद रोककर अंतिम गेंद पर चौका, धैर्य और संयम ; जैसे हमें कहता जिंदगी के कठिन दौर में रुको समझो फिर आगे बढ़ो , बेबाक बल्लेबाजी हमें निडर बनने को कहता तो बार बार ये कहना की क्रिकेट को मैं रोज सीख रहा , अपने आप में सचिन को कितना बड़ा कद देता ; की हम जीवन में रोज कुछ न कुछ सीखें , हर दिन अवसर है चुनौती है सीखने की कुछ करने की ! सफलता के अम्बर के बीच एक इंसान जो सहज दीखता, दूसरों को प्रेरित करता, सचिन का जीवन हम सब के लिए आदर्श है !

सचिन के साथ वर्ल्ड्कप पुरे देश ने जीता ; बहुत ही मर्मस्पर्शी क्षण था वो और आँसू छलक आये जब उन्होंने क्रिकेट को अलविदा कहा था ! सचिन पूरा देश आपकों प्यार करता है, आपने अपने देश का नाम गौरव से ऊँचा किया है ! #

एक कविता इस महान इंसान के लिएsachin god of cricket

कभी हँसे जो मेरी हसरतों पर ..
हमने उन्हें भी सलाम किया …
सब लोग कहते है मुझे खुदा सा ,
पर मेरी ये खता नही मेरे रब ..
तेरी ओर ये नजर रखी,
और बस मैंने तो सपनो को अंजाम दिया ! !

Happy Birthday Sachin 🙂 

tv disease

आजादी २.०

ये कैसी आजादी की माँग है ; ये कौन लोग जो है समय समय पर भीड़ बनके आते है ; देश की आजादी का वर्तमान वर्शन जिसे पसंद नहीं ; मॉडिफाइड स्वराज और आजादी २.० की माँग कर रहे ! “अभिव्यक्ति की आज़ादी” को नई नई परिभाषा देने वाले लोग जो खुद इतना बोल जाते की इस देश में की सहिष्णु समाज भी असहनशील हो उठता !

nationalism india

जिन्हें देश के नाम से, देश के झंडे से नफरत है वो इस देश में अभिव्यक्ति के नाम पर देश के संविधान को धता बताते ; आज हुक्मरानों की ख़ामोशी कल एक बहुत बड़े शोर को बुला रही ! ऐसी पोषित मानसिकता पर मौन रखना बहुत बड़े तूफान को बुला रहा है !

जिस देश की मिटटी आपको जन्म देती, पालती पोसती अगर उसको माँ कहने में शर्म आती है तो आप कतई इस समाज के नहीं हो सकते ; जिस समाज की परिकल्पना आप कर रहे वो इस देश की पृष्टभूमि से अलग है ; कम से कम चंद उपद्रवियों को राष्ट्र के अभिमान को सियासी रूप में परिभाषित करने का अधिकार नहीं है !

राष्ट्द्रोह और राष्ट्रवाद के बीच कतई महीन रेखा नहीं है, एक स्पष्ट विभेद है ; हम जिस राष्ट्र में है उस पर हमें गर्व है, और जो इसका सम्मान नहीं करते वो राष्ट्रविरोधी है !

हमारा टीवी बीमार है या नहीं ये आप स्वंय सोचिये ;
मेरी नजर में मनुष्य एक संवेदनशील और विवेकशील प्राणी है,
कल्पना कीजये उस कृत्रिम दुनिया की …
राष्ट्र धर्म संस्कृति भाषा क्षेत्र जब सब आभासी ही मान लिया जाये,
तो फिर मनुष्य और एक रोबोट में क्या फर्क रह जायेगा ।
कृत्रिम विवेक वाला मानव जिसके लिए किसी भी चीज में फर्क करना महज एक प्रोग्राम सा होगा,
और उस प्रोग्राम का निर्धारण कौन करेगा ?
अगर राष्ट्रवाद का स्वरुप कोरा है एक मिथक है तो,
क्या जरुरत है हथियार, सीमा, और जवानों की,
हमारे कृत्रिम मष्तिस्क में कोई तनाव क्यों आएगा,
जब १००० किलोमीटर दूर देश के भूभाग पर कोई कब्जा कर ले,
क्यों हम उस चीज के लिए चीखेंगे जिस कश्मीर कन्याकुमारी को बस किताबों और कविताओं में पढ़ा,
जो हिमालय मुकुट है और सागर पैर पखारते ऐसी सारी कवितायें तो मिथक है,
वो कहानी जो बचपन में पढ़ी थी क्यों नहीं फाड़ दिया गया वो पन्ना,
जिसमें एक बच्चा खेत में बंदूके बोता है और कहता फसल की तरह,
अनेकों बंदूके पैदा होगी और देश के आजादी में काम आएगी !

अब टीवी बीमार है या हमारी मानसिकता ये स्वंय सोचिये !!

लेखक के निजी विचार ~ Sujit

Mahishasura

महिशाषुर घोटाला …..

आम जनता को अपने त्रस्त जीवन में कब फुरसत है की महिशाषुर की जाति का पता करें और रावण के ननिहाल को खोजे, बस राजनेता सब काम छोड़ इसके पीछे पड़ते रहते ; संसद सत्र में करोड़ों रूपये की बर्बादी अब महिशाषुर की जाति और रक्तबीज का ब्लड ग्रुप पता करने में किया जायेगा !

महिसाषुर गैंग को आगे गेंडास्वामी दिवस, शाकाल जयंती, मोगैम्बो इवनिंग, डॉ डेंग कल्चरल फेस्ट मनाते हुए आप देखेंगे जो फर्जी मुठभेड़ में शहीद हुए थे !

अगर रक्तबीज का ब्लड ग्रुप पता लगाया होता तो वो आज जिंदा होता,सरकार ने सही समय पर इलाज मुहैया नहीं कराया ! महिशाषुर के सेनापति की हत्या हुई है !!

कुम्भकर्ण को नींद की गोलियाँ दी जाती थी इसकी उच्च स्तरीय जाँच होनी चाहिए !

सीट बेल्ट बाँध ले आप सतयुग में प्रवेश कर रहे ,आज संसद में महिशाषुर मुद्दे पर भारी गहमा गहमी हुई; इसी बीच शुम्भ निशुम्भ ने भी कोट जाने के तैयारी कर ली है, उनका कहना है महिशाषुर उनका सारा क्रेडिट ले जा रहे, उनका हक छीना जा रहा ।!

रामायण का एक श्लोक याद आ रहा – “जहाँ सुमति तहाँ सम्पति नाना; जहाँ कुमति तहाँ बिपति निदाना.. ”

महिशाषुर के भैसिया से ऊपर सोचियेगा तब न बुलेट ट्रेन मिलेगा !

लेखक के निजी विचार ~ Sujit

prime time political satire

प्राइम टाइम – पोएट्री व्हेन संसद एडजर्नड

prime time political satireन चले रे हवा न मिले रे दुआ
रुकी है संसद कैसे बने ये सभा ।

न तूने कुछ किया न मैंने कुछ किया;
करोड़ों की अशरफी कौड़ी में खो दिया ।

बोते बीज बनाते बाँध बचाते बाढ़ ;
खेतों की फसल को अख़बार खा गया,
हर योजना बस ट्विटर पर छा गया !

बरसों से वो मंदिर ही नहीं गया ;
तूने क्या कह दिया उन सबको ;
कल वो अल्लाह और राम पर लड़ गया ।

खाली पेट खाली जेब थी उसकी;
सुबह से कई चक्कर लगा चूका ;
राशन भी तो अब डिजिटल जो हो गया ।

दुहाई भी पड़ी सुनाई ;
रात की कोर्ट भी सजाई ;
बरसो बीते ..
अब तो दिन में भी नहीं देख पाती ;
वो बुढ़िया !
रात दिन क्या बेटे के मौत का मुकदमा ,
अब उसकी मौत ले आ गया !

कोई खड़ा मौत के साथ,
कोई पड़ा मौत के पीछे,
न खोया था तुमने कुछ ..
तो तुम चिल्लाते रहे ..
चीख के जिनकी साँसे छुटी ..
वो कहने से सकुचाते रहे ।

#SK …

RIP DR KALAM

कलाम को सलाम ….

ए पी जे अब्दुल कलाम – अवुल पकिर जैनुलाअबदीन अब्दुल कलाम (भारत के राष्ट्रपति, मिसाइल मैन, लेखक) जन्म 15 अक्टूबर 1931 – 27 जुलाई 2015, रामेश्वरम, तमिलनाडु, भारत ! डॉ कलाम हमेशा से बच्चों युवाओं ही नहीं पुरे देश के लिए प्रेरणाश्रोत रहे ! इनका जीवन हर एक देशवासी को सपने देखने का हक़ देता, आपके अंदर जज्बा हो तो आप अपने सपनों को पूरा कर सकते ! डॉ कलाम ने विज्ञान और सुरक्षा में जो योगदान दिया है आज उसके बदौलत हम आत्मनिर्भर है, स्वाभिमानी है !

डॉ कलाम एक प्रेरणाश्रोत – डॉ कलाम के लिए भारत देश पहले था, उनके लिए सब धर्म सामान था, लोगों को प्रेरित किया की वो देश को महत्व दे, शिक्षा, तकनीक को ऊंचाई पर ले जाये, कभी राजनैतिक पक्ष नहीं अपनाया ! युवाओं और बच्चों को अपने सपनों को पूरा करने के लिए हमेशा प्रेरित करते रहे !

विंग्स ऑफ़ फायर – Wings of Fire – इस किताब को पढ़ने के बाद उनके बचपन और उनके संघर्ष को जानने का मौका मिला, कैसे उन्होंने आर्थिक कठिनाइयों के बीच अपना शिक्षण जारी रखा, वहाँ से मिसाइल मैन बनने तक सफर, प्रेरणादायक जीवन की झलक है इस पुस्तक में ….

आज वो हमारे बीच नहीं रहे .. एक उनकी कविता जो नैपथ्य में कहीं उनके शब्दों में गूंज रही ..
एक कविता अग्नि की उड़ान से

माँ

समंदर की लहरें,
सुनहरी रेत,
श्रद्धानत तीर्थयात्री,
रामेश्वरम् द्वीप की वह छोटी-पूरी दुनिया।
सबमें तू निहित,
सब तुझमें समाहित।

तेरी बाँहों में पला मैं,
मेरी कायनात रही तू।
जब छिड़ा विश्वयुद्ध, छोटा सा मैं
जीवन बना था चुनौती, जिंदगी अमानत
मीलों चलते थे हम
पहुँचते किरणों से पहले।
कभी जाते मंदिर लेने स्वामी से ज्ञान,
कभी मौलाना के पास लेने अरबी का सबक,
स्टेशन को जाती रेत भरी सड़क,
बाँटे थे अखबार मैंने
चलते-पलते साये में तेरे।

दिन में स्कूल,
शाम में पढ़ाई,
मेहनत, मशक्कत, दिक्कतें, कठिनाई,
तेरी पाक शख्सीयत ने बना दीं मधुर यादें।
जब तू झुकती नमाज में उठाए हाथ
अल्लाह का नूर गिरता तेरी झोली में
जो बरसता मुझपर
और मेरे जैसे कितने नसीबवालों पर
दिया तूने हमेशा दया का दान।

याद है अभी जैसे कल ही,
दस बरस का मैं
सोया तेरी गोद में,
बाकी बच्चों की ईर्ष्या का बना पात्र-
पूरनमासी की रात
भरती जिसमें तेरा प्यार।
आधी रात में, अधमुँदी आँखों से तकता तुझे,
थामता आँसू पलकों पर
घुटनों के बल
बाँहों में घेरे तुझे खड़ा था मैं।
तूने जाना था मेरा दर्द,
अपने बच्चे की पीड़ा।
तेरी उँगलियों ने
निथारा था दर्द मेरे बालों से,
और भरी थी मुझमें
अपने विश्वास की शक्ति-
निर्भय हो जीने की, जीतने की।
जिया मैं
मेरी माँ !
और जीता मैं।
कयामत के दिन
मिलेगा तुझसे फिर तेरा कलाम,
माँ तुझे सलाम।

उनके प्रेरणादायी शब्द … #DRKalamQuotes


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मिसाइल मैन को ह्रदय से श्र्द्धांजलि – कलाम तुझे सलाम !!

सियासत ए राजधानी …

दिल्ली जहाँ सियासत कभी खत्म नहीं होती ! हर सुबह कई वादों की सौगात लेके आती ; तो शाम बिखरे वादों पर कहकहे लगाती ढल जाती ! राजनीती शास्त्र भी है शस्त्र भी उपयोगिता पर निर्भर है !!

विरोध तो स्वरुप है चिंतन का ही ; और एक प्रगतिशील चिंतन के लिए आवश्यक है विरोध ! पर विरोध का स्वरुप निकृष्ट ना हो ये हमारे विवेक पर आश्रित है ! तकनीक की उपयोगिता ने हमे सक्षम बनाया है की हम तर्क कर सके ; अपने विचार रख सके ; पर इसी परिचर्चा में कुछ विवेकहीनता भी उजागर हुई है ।

चुनाव अवसर है विवेकपूर्ण निर्णय लेने का जनमानस के लिए तो जन प्रतिनिधियों के लिए ये चुनौती कम जिम्मेदारी ज्यादा है ! कर्तव्य निर्वाह से लेकर पद लोलुपता सब इसी राजयोग का हिस्सा हैं ! निष्ठा और नीति स्वनिर्मित होती ये किसी शास्त्र में विदित अध्याय नहीं जो अर्जित की जा सके !

जनमत को कैसे परिभाषित करेंगे हम “ये तो ना भगवा है ना खादी है ; ये ना ही टोपी है ना तो लँगोटी है ” ये तो कभी भूख है तो कभी रोटी है !

सन्दर्भ की ओर रुख करे.. फिर सियासते ए राजधानी में महापर्व आयोजित है ! ” फिर कुछ वादे है जो पिछली दफा आधे थे फिर से उसको सब साधे है ” !

जनसभा तो होती ही है प्रायोजित आयोजित होती ही आ रही ; पर एक जनआंदोलन कहीं अपना अस्तित्व खो गया इन घटनाचक्र में खोकर कहीं दम तोड़ गया ! कुछ पुरानी स्मृति में लौटे तो शायद ही कुछ दशकों में जनमानस आंदोलित हुआ होगा ! आजादी की ख़ुशी खुमारी में वक़्त बीतता गया सरकारें आती जाती रही, नालें पुल सड़क बनते रहे बिगड़ते रहे ! और फिर दशकों दशकों के सफर में तंत्र में विकृतियाँ भी समाहित हुई । और एक चरम पर आके परम्परागत राजनीति ने इसका दुरूपयोग भी भरपूर किया और लोगों की उम्मीदें पीछे छूटती चली गयी ; खुद अपने चुने हुए प्रतिनिधियों से अपेक्षा रखके जनता बार बार उपेक्षित होती रही !

आम नगरी/शहरी नागरिक से लेकर गाँव की सरल साधन विहीन जनता भी अपने जीवनस्तर में आये ठहराव से कहीं ना कहीं असंतुष्ट था ; जो भी उम्मीदें इस तंत्र से उसको थी उसमें ठहराव आ गया था ! और ऐसी ही कई चीजों की दबी मायूसी को एक चिंगारी चाहिए था ; चिंगारी था “लोकपाल” भ्रष्टाचार मुक्त भारत का नारा ; केवल लोग भ्रष्टाचार ही नहीं अपनी सभी मायूसी को इस जनांदोलन से जोड़ के देखने लगे ; गरीबी, अशिक्षा, बेरोजगारी, विकास, स्वास्थ्य सभी मुद्दों से हतोत्साहित लोगों को व्यवस्था के खिलाफ आवाज उठाने का एक मंच मिला और एक सिरा जिसे पकड़कर दूर जाया जा सकता था ! विरोध का ऐसा मंजर शायद ही दशको से किसी ने देखा होगा उच्च पदाधिकारी से लेकर इस तंत्र को चलाने वाले लोग भी अपनी भागीदारी दे रहे थे ; शिक्षक, कलाकार, क्षात्र, गरीब, अमीर, अभिनेता सब विरोध के इस मंच से इस कदर जुड़ते गए की जनसैलाब ने इस लोकतंत्र से सवाल कर दिया की हम जिसे चुने वो काम नहीं करे तो क्या करे ? क्यों हमे हक़ नहीं मिलता ? हमारा देश का विकास क्यों अवरुद्ध है ? हमारे देश का युवा क्यों बेरोजगार है ! शायद कभी ही ऐसा हुआ था की लोग अपने रोजगार और उद्यम को छोड़ डट गए थे लोकपाल आंदोलन से ! व्यक्ति का जुड़ाव अपने आप में एक आंदोलन के लिए व्यापक था !

political-india

घटनाक्रम बदला फिर आंदोलन में सलग्न एवं कथित जनक कार्यकर्ताओं ने इस सिद्धांत पर चलने का निश्चय किया की – “राजनीति को सही करने के लिए इसमें भाग लेना होगा” एक अलग राजनीति सबके सहयोग और सहभागिता की राजनीति ; शिक्षित वर्ग की राजनीति ; मुद्दों की राजनीति ! कदम सार्थक था ; जनसैलाब को आशा की किरण दिखाई पड़ी की जब विगत वर्षों से परम्परागत राजनीती से कुछ नहीं मिला तो एक बार ये कदम भी सही ! इस तरह जन आंदोलन का राजनैतिक पदार्पण होता और आरम्भ होती नई राजनीति की नई परिपाटी ! क्या कदम ये सार्थक था ? मत विभिन्न हो सकते पर एक युवा और शिक्षित वर्ग ने जरूर इसे सार्थक माना !

बस “राजनीती शास्त्र भी है शस्त्र भी उपयोगिता पर निर्भर है ” और सियासत के मंच पर इतने घटनाक्रम आते रहे की उस जनआंदोलन का जो स्वरुप था अब वो धूमिल सा हो रहा ! कहीं चूक हुई ? क्या हुआ आखिर ऐसा ? स्वतंत्र समीक्षा की जा सकती है आइये करे – बड़े कार्य को संपादित करने के लिए छोटे छोटे चीजों से पहल की शुरुवात हो सकती ; यूँ ही फसल तो खेतों में नहीं उगती ; जुताई, बुआई से लेकर किसान कितने मेहनत करता ; अगर देश के राजनैतिक बंजर हो चुकी थी हम बंजर बेजार का रोना एक बार रो सकते लेकिन अगले दिन से उसे जोतने कोड़ने का तो काम शुरू ही करना होगा ; अगर हम दूसरे किसान के जमीन का रोना रोये की मुझे बंजर जमीं मिली ; तो अंततः हासिल कुछ नहीं मिलता ! आरोप प्रत्यारोप और अपनी अभिलाषा के बीच का असंतुलन हमे अनुशासनहीन हीन बना देता ; और हम अपने विवेक का दुरूपयोग करने लगते ! वक़्त से पहले हम कुछ बदल नहीं सकते ; दूसरों से प्रतिस्पर्धा में अक्सर अपना अक्स भूल जाते, रोज परिस्थितयों को दोष देना हमारी कमजोरी का सूचक होता ! ऊपर की विवेचना से आप समीक्षा कर सकते “जन आंदोलन से राजनीति में आये नयी पार्टी के संदर्भ में ; घटना क्रम से जोड़ कर विशेलषण कर सकते की क्या क्या इस सियासत में हुआ !

तो क्या राजनीति को बदलने जो आये थे उनको राजनीति ने ही बदल दिया ; शायद नहीं वो आज भी वैसा ही करेंगे जिस मकसद से जन सैलाब उमड़ा था ! लेकिन उनकी कुछ गलतियाँ जिसका इन्तेजार पुराने राजनीति के दिग्गज कर रहे थे की ये कुछ ऐसा गलती कर जाये की इन्हें संदर्भ विहीन किया जा सके ! और यही हुआ भी ; बिखरे उमीदों को वापस जोड़ना मुश्किल है लेकिन आंदोलन से आगे आये लोगो का राजनैतिक पतन भी एक अवसाद ही होगा हमारे देश के लिए फिर को शिक्षित, युवा अपने देश को बदलने का वीरा उठाने नहीं आयेगा !

बचपन की एक कहानी याद आ गयी ” बाबा भारती को एक घोडा था ; राजा को पसंद आ गया ; बाबा को डर प्रलोभन इत्यादि देने के बाद भी राजा को घोडा नहीं मिलता ; फिर वो भेष बदलकर एक बीमार राहगीर बनकर बाबा को रास्तें में मिलते; बाबा दया भाव से घोड़े पर बिठा कर उसे ले जाने लगते ; राजा चालाकी से घोडा लेके भागने लगता !
बाबा भारती ने कहा घोडा ले जाओ राजन लेकिन ये बात किसी को नहीं कहना की तुमने कैसे घोडा लिया ; लोगो का मानवता पर से, अनजान की मदद से, दयाभाव से विश्वास उठ जायेगा” !

बस विवेकपूर्ण निर्णय लीजिये, सरकार नहीं अपना भविष्य चुनिए “याद रहे कोई भरोसा कोई विश्वास हमेशा के लिये इस समाज से ना उठ जाए” !

— और फिर ….

जनमानस के लिए हर्ष की बात होनी चाहिए जब जब लोकतंत्र विजयी होता है ; आप किसी भी पार्टी विचारधार से जुड़े हो आप भी चाहते इस लोकतंत्र में सभी लोगों की सहभागिता बढे ; क्या आप नहीं चाहते की शिक्षित वर्ग आके सत्ता पर आसिन हो ; जहाँ पर जन जन की विकास की बात हो तो फिर आज विषाद कैसा ? जीत और हार विचारधारा की होती ! और समय के साथ ये परिवर्तित भी होती ; ६० साल से राजनीति की धुरी रही एक पार्टी जिसमें लाल बहादुर, नेहरू, इंदिरा से राजनितिज्ञ रहें आज सन्दर्भविहीन हो रहीं ! ये मात्र बदलाव ही नहीं सजगता का भी परिचायक है ; राजनीति का एकाकीपन भी खतरनाक है और अवसर बनते है नये लोगों के लिए वो आगे आके एक विकल्प बने तो ये देश के लिए एक स्वस्थ परम्परा की शरुवात ही है ! आज प्रधानमंत्री भी एक अपनी दूरदर्शिता लेके केंद्र में है तो दिल्ली की राज्य सरकार में एक नये परिदृश्य को स्वीकार कीजये ! लोकतंत्र विजयी है राष्ट्र प्रगतिशील है और आप सभी जन जन इसके जनक है !

देश की राजनीति में एक नई परिपाटी के जनक को शुभकामनायेँ !!

Written By – Sujit

our religion

दो बीघा धर्म … !!

टीवी . . अख़बार. . रेडियो. . संसद. . रोड. . बाजार. . चौक. . चौराहा. . !!
देह . . दिमाग . .पेट . . सब जगह धर्म चढ़ गया है !! धर्म पोर्टेबल हो गया – व्यक्ति वस्तु स्थान के हिसाब से बदला जा सकता ! धर्म डॉल्बी डिजिटल साउंड हो गया – संसद में घंटो गले फाड़ चीखा जा सकता ! राजनेता, अध्यापक, लेखक, शिक्षक, कलाकार से लेके सबने अपने अपने रूप में धर्म को विचार, व्यव्हार, आवश्यकता, पेशा के अनुरूप परिभाषित कर दिया कुछ इस तरह …

हम सबने मिलके धर्म को क्या बना डाला कभी सोचा ?

धर्म खबर बन गया ;
धर्म अधर बन गया ;

दो पाटों में पिसता ;
अपनी धुरी पर घिसता ;

धर्म नजर बन गया ;
धर्म बेखबर बन गया ;

धर्म शक बन गया ;
धर्म बेशक बन गया ;

धर्म रंग बन गया ;
धर्म बेरंग बन गया ;

धर्म राग बन गया ;
धर्म बैराग बन गया ;

धर्म हानि बन गया ;
धर्म कहानी बन गया ;

धर्म जाप बन गया ;
धर्म प्रलाप बन गया ;

धर्म काल बन गया ;
धर्म जाल बन गया ;

धर्म संवाद बन गया ;
धर्म विवाद बन गया ;

धर्म राज बन गया ;
धर्म ताज बन गया ;

धर्म नारा बन गया ;
धर्म किनारा बन गया ;

धर्म हुंकार बन गया ;
धर्म पुकार बन गया ;

धर्म बाजार बन गया ;
धर्म औजार बन गया ;

धर्म अर्थ बन गया ;
धर्म व्यर्थ बन गया ;

आखिर हमने इस धर्म को क्या बना दिया …

our religion

वो अबोध बच्चा जिसे कुछ मन्त्रों से अब हिन्दू बना दिया गया; या वो आदिवासी जिसके गले में क्रॉस लटकाकर ईशाई ; या वो गरीब परिवार जिसके नाम में खान या मोह्हमद लगाकर उसे एक नए मजहब मसीहा से जोड़ दिया जाता ! क्या ये दिल से मन से परिवर्तन है ! और परिवर्तन भी तो किस चीज का ? मात्र कर्मकांड और नाम वेश-भूषा धर्म का आवरण हो सकते परिचय तो नहीं !!

वो गरीब किसान तंग आ चूका होगा ; उसे भी सबके तरह अपने पूर्वज से २ बीघा जमीन नहीं मिली खेती करने को ; अपने परिवार का पेट कैसे पालता ; उसे अपना धर्म मालूम था उससे उसने २ बीघा बेच दी ! और आप सब ने अपने भूख के लिए २ बीघा धर्म भी नहीं बेचने दिया उन गरीबों को ; भूख गरीबी ने कमर तोड़ दी थी क्या मंदिर जाता ; कोई निवाला हलक में नहीं जाता क्या देवों को भोग लगाता ; उसी धर्म के नाम से ही सही आप सब उनकी भूख मिटाने के लिए क्यों नहीं आगे आते ? लाखों करोड़ो का आयोजन हो जाता पर ; जुलुस विरोध शोर नारे पर कभी सुना वो आवाज की किस परिस्तिथि ने किसी को अपना धर्म छोड़ने के लिए मजबूर किया होगा !

अक्सर हम सुनते ही है – दक्षिण में गणपति मंदिर, साईं बाबा ट्रस्ट ; अजमेर शरीफ ; बनारस ; वैष्णो देवी मंदिर ! नजाने कितने मंदिर, मस्जिद, गुरूद्वारे के फण्ड रोजाना लबालब होते जा रहे ! सच में अपने धर्म के रक्षक बनते तो उन मासूम , लाचार , बेबस लोगों के लिए आगे आइये की किसी को धर्म की दो बीघा जमीन ना बेचनी पड़े !

सामने रोते बच्चे को रोटी नहीं दे पाने की टिस; गरीबी में जीवन काटकर तिल तिल मरते परिवार; फुटपाथ पर गुजारते और ढंड में कांपते चेहरे ; रोज रात परिवार चलाने की चिंता में झुकते कंधे ;इनसे धर्म पूछते ? हक़ नहीं किसीको ! रोटी, भूख, तड़प, गरीबी का कोई धर्म नहीं !

बाँटिये कम्बल इस सर्द रातों में !
गरीब के मरते बच्चों को अस्पताल ले जाइए !
भूख से सूखे हलक में निवाला डालिये !

तब आप गर्व से अपने धर्म का नाम ले सकते !

उसके कर्म को परिवर्तित कीजये ; नहीं तो दो बीघा धर्म बिकता ही रहेगा !!

धर्म तो अपने कर्म और जीवन के बीच सामंजस्य लाने की व्यवस्था ही तो है ; सत्य, सौहार्द, प्रेम, इंसानियत, प्रकृति ये धर्म से ही तो निहित तो है !

स्वंय विचार कीजये !

– किसी घटना से संबंध नहीं (लेखक के अपने विचार )