Category Archives: Stories

rain emotion story

संवेदना ….

बारिश .. छोटा शहर तो तंग हो जाता रोज रोज के इन छीटों से ; हर सड़क हर गलियाँ सनी हुई सी, ऊँघती हुई पुरानी बिल्डिंगें टूटे टूटे दरारों में बारिश की बूंदों ने अपना रस्ता बना लिया था ! बच्चे मायूस हो खिड़की से गुम होते शाम को देखते जा रहे ; आज भी बाहर खेलने जाने का सब प्रयत्न व्यर्थ सा हो गया ; गुस्से से बादलों की अनगिनत कड़ियों की ओर देखता मुँह बनाता हुआ ! कारों के वाइपर बारिश को हटाने का भरसक कोशिश करते हुए दौड़ी जा रही, कुछ गड्ढों में पड़कर जोर से पानी उड़ाता हुआ ; वो साइकिल से जा रहा बच्चा बड़े गुस्से से घूर के देखता रहा नजरे ओझल हो जाने तक ! जैसे रोक के कोई पुराना हिसाब समझता उस कार वाले को ! फिर मस्ती में अपने पैडल मरने में व्यस्त हो जाता !

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रात होने को थी, जल्दी में आधा भींगा भागता हुआ चौराहे पर इधर उधर “भैया चलोगे प्रेस जाना है और फिर यहीं आकर छोड़ देना ; रिक्शे वाले ने सुनसान सड़क पर नदारद से सवारी के इन्तेजार में हामी भर दी ; भैया आने जाने का इतने दे देना ; अरे भैया कुछ कम ले लो, जल्दी चलो ; बाबू क्या कम करूँ, इतनी बारिश में.. रात भी होने को आ रही ! ठीक है चलो “कुछ दूर चलने पर ठिठक सा जाता रिक्शे वाला, बाबू रुकिए पीछे से लम्बा सा पॉलीथिन निकाल के वो रिक्शे के एक छोड़ पर बाँध के अपने पीछे डाल लेता और चलने लगता, वो कहता भैया आप भी रख लो सर पर भींग जाओगे ” बाबू आप ठीक से अंदर ढक के बैठो सर्दी लग जाएगी, तबीयत बिगड़ जाएगी ; हमारा क्या .. “हमरा अर के भागों में छ्ये एन्हे रोज तितना क्तत्ते पन्नी ओढ़बए .. आये भोरे से ये बरषा ने चैन ने लेने देने छ्ये” ये कहकर वो आगे पैडल पर अपने पैरों को मारने लगा ! दोनों ओर से पानी की बुँदे उसके बनाये छत से टपक रही थी तो आगे उसके चेहरे पर पसीने और बारिश का विभेद मिटता जा रहा था ! मैं स्तब्ध बस महसूस कर रहा था संवेदना के शब्द बार बार गूंज रहे थे ” बाबू आप ठीक से अंदर ढक के बैठो सर्दी लग जाएगी, तबीयत बिगड़ जाएगी ” !

रात दोनों तरफ सड़कों के बीच भींगे भींगे हरे पेड़ अँधेरे में काले काले किसी डरावाने से चीज के तरह प्रतीत हो रहे थे, गंतव्य पर पहुँचकर उसने एक नोट आगे बढ़ाया और बीच बारिश में चुपचाप भींगता हुआ निकल चला; आज वो भींगना चाहता था एकबार; उसके चारों तरफ अब बारिश के बूंदें नहीं थी, न था चेहरों पर भीगीं सिलवटें बस उसके अंदर एक शोर था .. सन्नाटे को चीरता …. संवेदना का स्वर !!

#SK .. Feelings in Time of Rain !

एन इवनिंग इन मेट्रो – मेट्रोनामा !!

इक ऐसी ही शाम रोजमर्रा की .. नियत समय से मेट्रो में अपने गंतव्य की ओर जाने को आतुर और दुनिया भर की बातों की धुनी जमाए अपने कार्यस्थल के मित्रों के साथ .. निशांत, आदर्श, दिनेश !ऐसे ही कुछ पड़ाव पार करने पर फोन की ट्रिन ट्रिन; बातचीत में विराम सा लगाती; राज का फोन था, सोचा शाम में, सुबह शायद वजह होती “सर जी लेट हो रहा” ऐसे शाम को सर जी को याद रखने वालों की कमी ही है,फिर पूछा बताये – सर आप मेट्रो में हूँ, स्वीकृति में हाँ कहाँ सर आज कुछ विलम्ब हो सकता.. राजीव चौक में कुछ लाइन डिस्टर्ब है .. आप बस या ऑटो से चले जाना; ये विलम्ब सुन के थकान और बढ़ गयी !

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फिर सोचा चलो देखते, सब मित्रों ने भी हाँ में हाँ मिला दी, अरे चलते बाद में देखेगें वहाँ जा के ! आदर्श भाई कुछ ज्यादा ही उतेजित होते .. लड़कपन है अभी !! दिनेश और निशांत सर ने हामी भरी .. चलते है //राजीव चौक के पहले ही संकेत मिल रहे थे मेट्रो की धीमी रफ्तार और बेतहाशा भीढ़ की आगे क्या होगा ! पहुँचे किसी तरह .. धक्का मुक्की भाई जरा .. किसी तरह चलने वाली सीढी तक और फिर ऊपर की तरह नजारा मेले जैसे था,गुच्छे में लोग, जैसे ७-८ लाख लोगों को रोज अपने गंतव्य तक आने ले जाने वाला तंत्र बेबस सा .. भीड़ बढती जा रही थी, अब हमे सोचना था क्या किया जाये मेट्रोनामा छोरे और चले दिल्ली दर्शन की ओर !

बस निकले किस ओर से पता नहीं, स्टेशन का गेट बंद ही होने वाला था, ऊपर थी फिल्मों वाली दिल्ली .. इवनिंग @ कनाट प्लेस ! तड़क भड़क से भरपूर .. रेस्त्रां-बार इक बार तो मन हुआ .. काश वीकेंड होता ….चलो आगे चलते साथ बचे थे निशांत जी और कुमार आदर्श .. पूरा इक चक्कर मारा की बस कहाँ मिले ..कुछ नहीं मिला .. पान वाला से पता पूछिए अनजान सड़कों पर, भाई इधर से सीधा, लाल बत्ती पार कर खरे हो जाओ बस ..चलने लगे उसी ओर .. बसें पता नहीं अनेकों संख्याओं वाली लाल हरी ..कहाँ जाती पता नहीं .. सड़कों पर मेट्रो बंद का असर था, ऑटो कोई जाने को तैयार नहीं ! अब क्या करना .. घूमते घूमते आकर बैठ गये फुटपाथ के किनारे !

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कवि की कल्पना उमरने लगी …

अनेकों चेहरों की देखों अनजान सी लगती देखती एकटक,
कुछ नहीं कहती, दिन ढलने का सबब है इन चेहरों पर,
ये बड़ी लेम्पपोस्ट, दुधिया रोशनी बिखेरती खरी है !
भागती सड़कों पर क्या है जिंदगी परेशान सी,
कुछ दूर ही ऊपर चाँद भी दिख गया इस शहर में,
कुछ पूछा नहीं उस चाँद से क्या सोच रहा वो !

आदर्श भाई लपक के ये चना भुजा कितने का है .. ३० का ४० का जल्दी बोलों, छोरो यार सब लूटने को बैठे है .. इक हँसी फैली और चल दिए !कुछ पल बैठे रहे, मेट्रो में नीचे जा के इक असफल प्रयास किया ५०० की लंबी कतार हिम्मत टूट गयी जाने का ! फिर पुनः उसी जगह ..आते जाते लोगों को निहारते,लग रहा था .. आपातकाल हो देश में, पुलिस की गाड़ियां .. पीछे हो जाओ .. लाइन में खरे रहो .. इक महिला उलझ रही थी ..क्या सुरक्षा ..नहीं जाना पीछे ..बस पकरना है.. सड़क पर नहीं तो कहाँ जाये ! शाम थकान से परे खुशनुमा सी हो गयी थी .. घर जाने की जल्दबाजी ढल गयी थी इसी शाम के साथ ! फिर बस इसी तरह कुछ देर बाद “मेट्रो अब पुनः सेवा के लिये तैयार है” सुनते ही .. चले मेट्रो स्टेशन की ओर वहीँ रोज का सफर अपने गंतव्य की ओर .. मेट्रोनामा कुछ संगी साथी .. इक शाम यूँ ही !!

पात्र :
दिनेश : @0_dinesharma
निशांत : @YNishant
आदर्श : @ErKumarAdarsh
राज : @raj_kabira
और मैं …… @sujit_kr_lucky

एक छोटी सी ख्वाबों की कहानी – Story By SK

ऐसे ख्वाब का क्या भरोसा, नींद में क्या आते जाते टूटते रहते !
ऐसी ही एक नींद भरी रात थी, आज किन यादों को नींद को लेके नींद आयी थी !
ख्वाबों की रातों की एक छोटी कहानी में चंद किरदार है; चंद यादें है !

कल्पनाओं के समन्दरों की गहराई क्या होंगी .. ऐसी ही कुछ अनजाने थे वो ख्वाब ;
किसी पुराने गीत को सुनते या सोचते ये तो उसका मन ज्यादा जानता होगा,
आँखें बेजार सी हो गयी थी.. सर्द रातों में सिहर के नींद में खो चूका था मन !
आस पास स्तब्ध, ओस में नहायी गलियाँ, कुछ शोर कभी कभी आस पास डरावने से लगते,
पर महानगरों की गलियों और मकानों की अनगिनत मंजिलों में ये दब सा जाता सब वहम !

ख्वाब का पहर ….

ये बचपन उसका नहीं था, दूर कहीं घास के मैदान पसरे, अपने बचपन से काफी वाकिफ था वो;
यहाँ काफी सुकून था कोई पहाड़ी गाँव था, शाम को वो अपने छोटे से बाँसों के उबड़खाबड़ से वो निकलता है खेलने,
कुछ दूर ही घास का पहाड़ी ढलान पर, कुछ बच्चे उसके आस पास अपने अपने अटखेलियों में मशगुल !
इसी तरह वो भी किसी कौतुहल में संलग्न कुछ दूर चलते, उसके छोटे कदम लड़खड़ाते हुए ;
कुछ दूर एक पुराने परे बेंच के पास, जैसे उसके इंतेजार में कोई बैठा ! वो पास जाता कुछ पूछता नहीं ;
उसे कोई कविताओं वाली सिंड्रेला की कहानियों वाली परी सी लगती वो, बिल्कुल आसमानों वाली कोई छोटी बच्ची,
जिसके में गोल सी टोपी, और उसके हाथ छोटे उँगलियाँ गालों पर टिकाये जैसे उत्सुक हो कुछ बोलती नहीं,
नन्हीं सी मुस्कान बस .. कौन उसे इसे लाया यहाँ इस सुनसान पहाड़ी मैदानों में ! वो उसके हाथों को पकड़; गोल गोल घूमने वालें,
कुछ कौतूहलता वालें खेल खेलता .. ऐसे कई दिन जैसे उसका बचपन ठहर सा गया था !
फिर शाम होती उसको छोर आता एक सड़क था जहाँ से दूर वो ओझल सी हो जाती ; कहाँ से आती वो हर शाम ना पूछा उसने !
वो खुश था एक नन्हें संगी के संग .. रोज उसके हाथों को पकड़ वहीँ पुनरावृति खेलों की !

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और ऐसे ही कितने दिन ..

एक दिन उसी जगह जाता, आज वहाँ कोई नहीं आया था ! वो बार बार सड़क तक जाता पुनः मैदानों तक,
खाली परे बेंचों पर खुद से उलझने की कोशिश में, झाँकता उस पहाड़ी से उतरने वालें रास्ते की ओर, की कोई शायद आता होगा !
फिर बचपना ही ऐसा पैर पटकते हुए कुछ दिन, आदत भूलता हुआ आसपास उन्हीं कुछ बच्चों के शैतानिओं में खुद को उलझाते हुए,
समेटते हुए अपनी कुछ यादों को .. जैसे कोई छुट जाये बचपन उतना याद नहीं रखता !
ऐसे सुबह हो आयी थी .. कुछ यादों में उसके था वो नन्ही सी लड़की, और वो था किसी नये समय !
एक पल मन में टटोलता हुआ कौन था वो बच्चा .. कब का था ये सपना .. कौन सी थी वो जगह !
खूबसूरत था सपना .. खूबसूरत था वो पहर और ये छोटी सी ख्वाबों की कहानी !!

~ सुजीत