Author Archives: Sujit Kumar Lucky

About Sujit Kumar Lucky

Sujit Kumar Lucky - मेरी जन्मभूमी पतीत पावनी गंगा के पावन कछार पर अवश्थित शहर भागलपुर(बिहार ) .. अंग प्रदेश की भागीरथी से कालिंदी तट तक के सफर के बाद वर्तमान कर्मभूमि भागलपुर बिहार ! पेशे से डिजिटल मार्केटिंग प्रोफेशनल.. अपने विचारों में खोया रहने वाला एक सीधा संवेदनशील व्यक्ति हूँ. बस बहुरंगी जिन्दगी की कुछ रंगों को समेटे टूटे फूटे शब्दों में लिखता हूँ . "यादें ही यादें जुड़ती जा रही, हर रोज एक नया जिन्दगी का फलसफा, पीछे देखा तो एक कारवां सा बन गया ! : - सुजीत भारद्वाज

अहसासों को कभी पूछना …

laugh-1966858_640तुम अपने ताल्लुक के,
अबूझ हिस्सों में मुझे कभी देखना,
उस ओर भी एक दिलचस्प इंसान है,
बिलकुल तुम्हारी उम्मीदों की तरह का !

उम्मीदों के पहाड़ सा ढक दिया तुमने,
जज्बातों को घुटन की आदत सी हो जाएगी,
कभी खुले खुले में ला के देखना,
ये जज्बात बड़े खूबसूरत से होते है !

अहसासों को कोई ऐसी वजह न दो,
वो बिखर जाते तो फिर पनपते नहीं,
बस बंजर से दो दिलों को ताउम्र धड़काते रहते,
या जलाते रहते सीने में आग बनकर,
उन्हें तो छांव दो फूल बनके महक सके !

अहसासों को कभी पूछना,
वो कभी खामोश नहीं रहना चाहते,
बस कोई ऐसा सबब दो,
की वो हर पल मुस्कुरा सके !

#SK – Insane Poet

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यूपी का चुनाव-प्रचार

जनता की सेवा के लिए हो गया,
पिता पुत्र में भी तकरार,
ये है यूपी का चुनाव-प्रचार !

इधर के उधर गए,
और उधर के नजाने किधर गए,
मिल बैठे सब नदियों जैसे,
धूल गए पुराने कर्म और विचार,
ये है यूपी का चुनाव-प्रचार !

घी-तेल सब चुपड़े खायेंगे,
अब कोई क्यों करे व्यापार,
माटी छोड़ अब मंदिर महल बनेंगे,
अब राम जी का ही करेंगे ये बेड़ा पार,
ये है यूपी का चुनाव-प्रचार !

न कोई ऊँचा न कोई नीचा,
जपते रहे विधि के सरताज,
वोटर है अब भाई भाई,
घर में पड़ी वोट की मार,
ये है यूपी का चुनाव-प्रचार !

#SK

who talks a lot

तुम भी कभी बहुत बोलते थे….

बातों का सिलसिला अब वैसा नहीं चलता,
लम्बी फेहरिस्त होती थी बातों की,
मैं पहले तो मैं पहले की तकरार,
अब रुक रुक कर कभी कभार मैं कुछ पूछता,
और ठहरे ठहरे से तुम भी कभी बोलते,
मुँह फेर के तुम भी रहते,
बेमन से मैं भी कुछ कह देता,
बाँकी के खाली हिस्सों में,
लम्बी सी चुप्पी छा जाती,
उस ख़ामोशी की खाई में,
तेरी तस्वीर सी बनती है,
जो कुछ कहती तो नहीं,
हाँ याद दिलाती है,
तुम भी कभी बहुत बोलते थे !

#SK

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नेता जी – #MicroPoetry

सड़कों के भी पाँव पखारे जाने लगे,
लगता है नेता जी दौरे पर आने लगे !

लग गए विश्वकर्मा अब बनाने में पुल पुलिया
नेताजी की गाड़ी जब चली जनता की गलियाँ !

उड़ने लगे अब सड़कों पर पर्चे,
नेताजी के आने के है बड़े चर्चे !

फूलों का लगा अब बड़ा सा टीला,
मंदिर में कान्हा सोचे ये किसकी है लीला !

#SK

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नव वर्ष के नए नभ में …

बुझते अलाव सा नहीं…
दहकते आग सा बन,
दृढ प्रतिज्ञ बढ़ो ऐसे,
जीवन के विस्तार को बुन,
थकन पाँव में या लगे कांटे,
रुकना न तू अपनी रफ्तार को चुन,
जो टुटा भ्रम था वो रात था,
सुबह हुआ अब ऐसे ख्वाब तू बुन,
नव वर्ष के नए नभ में,
अपनी नई उड़ान को चुन ।।

#SK

नया चाँद …

new moonबालों के गुच्छों में एक चाँद है,
जो कंधे पर सर रखके,
सुकून के तरीके तलाशता है,
सुबह सुबह घूँघट डाले आधे चेहरे तक,
बरामदे पर धीमे क़दमों से चलती है,
किसी कोने में खड़े हो देखा है,
उसे बड़े लहजे से चाय पीते हुए,
दो चार घूंट के बाद जब नजर उठती,
टकड़ा जाती है आँखें उसके चेहरे से,
वो रोक देती है कप को होठों तक,
जैसे किसी इजाजत के इन्तेजार में,
रुक गए हो हाथ उसके !

कभी कभी दोपहर में दोनों हाथों को,
बरामदे के रेलिंग पर रख कुछ सोचती है,
शायद नया आँगन कुछ अनजान सा लगता होगा,
किसी के आने की आहट सुन,
सकपकाते खींच लेना वापस घूँघट को,
सीख लिया है उसने रिवाजों को अपने लहजे में !

बस बाँहों की गिरफ्त ही नहीं आये उसके हिस्से,
कंगन बिंदी नये संवाद सबको ही अब चुन लिया उसने,
नये नये गगन में अब एक नया चाँद उग आया था !

#SK

Love Life & Things

कुछ दिन जब …

Love Life & Thingsकुछ दिन जब तुम नहीं बोलते,
कुछ दिनों की चुप्पी होती,
फिर बोलने लगती हर चीजें
तुम्हारी तरह ।

सुबह सुबह खिड़की के पर्दो से झाँकती है धुप,
तुम्हारी शक्ल लेकर,
कमरे की वो दीवार,
जिसपे बड़ा सा कैनवास लगाया था,
बदल के हो जाती है,
उसकी सारी तसवीरें तेरे चेहरे जैसी ।

कभी गुजरता हूँ आइने के सामने से तो,
कंधे के बगल में तेरी परछाई खड़ी नजर आती ।

कुछ दिनों की आँख मिचौली ठीक थी,
आओ फिर बातें करते हैं
सब चीजों को वापस कर दे शक्ल उसकी,
जो तुम्हारी तरह हो गयी थी ।

#SK

किसे न इश्क़ हो इस मौसम से ? #AutumnDays

Autumn marks the transition from summer into Winter ….. किसे न इश्क़ हो इस मौसम से ?

Autumn Days Thoughts
ढलती रात अभी की, जैसे हवायें खुले खुले बदन से टकराकर अटखेली करती प्रेमिका सी लिपटती ; दूधिया रोशनी में नहायी सड़के और आसमां की खूबसूरती जैसे गुलज़ार की नज्म, उस नज्म से जैसे चाँद आसमां से उतरकर आपके बगल में आ बैठा ! जेठ की दोपहर के बाद जैसे रात का अहसास आज ही हुआ हो, उमस और तपिश के बाद पहली ओस की फुहार, किसे न इश्क़ हो इस मौसम से !

छत की मुंडेरों से घंटों देखना सड़क की ओर आते जाते अजनबी चेहरों में कुछ खोजने का कौतुहल, जैसे उसके चेहरे पर कुछ लिखा हो और असफल सी कोशिश उसे पढ़ने का ! आधी सी ठंड पर लिपटती आधी सी लिपटती चादर, जैसे चाहत हो कोई अधूरी सी ! कुछ रात ढलने पर पर उपजी सन्नाटों पर दूर कहीं निकल जाने का मन जैसे मन कुछ तलाशना चाहता हो !
किसे न इश्क़ हो इस मौसम से !

#Autumn #SK

गाड़ी – (#MicroPoetry)

ऊँची लम्बी गाड़ी,
खूब जोर का हॉर्न बजाती,
बगल में आके झटके से ब्रेक लगाती,
दिल धक् से रह जाता उस वृद्ध का,
अंदर गाड़ी से ठहाके की आवाज आती है ….

micropoetry