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महानगर की ओर …

दुरी है या खाई है फर्क मालूम ही नहीं पड़ता ; गिने चुने महानगर तक सिमट कर रह गया है देश ;  खबरें वहीँ की वहीँ बनती है वहीँ संवरती ! ये पलायन का किस्सा कबसे चला आ रहा और चलता ही जा रहा जैसे बंधुआ मजदुर हो ; रुकता  ही नहीं !

छोटे कस्बों शहरों को आपने बाजार दिया है खूब खरीदों टच वाले फ़ोन, ऐसी की हवा, फीट और इंच की टीवी, महकते इत्र, चमकते कपड़े, चिप्स केक आइसक्रीम विदेशी शराब फर्राटा दौड़ती गाड़ी सब दे दिया खरीदने को, पर ये नहीं सोचा की उन्हें ये सब खरीदने लायक कैसे बनायें ! खेत तो वही है परिवार बढ़ता गया टुकड़े होते गए खेत के, उस पर कभी सुखाड़ और बाढ़, परिवार बढ़ता गया आमदनी घटती गयी ; बाजार पसरता रहा ; मन सिमटता रहा !

खेत बेच कर किसी इंजीनियरिंग कॉलेज या मेडिकल कॉलेज की झोली भर के किसी दूर शहर की एक नौकरी ; अपना  फ्लैट और कार की कवायद और किस्तों में जिंदगी काटने की बात जोहते ! होली और दिवाली में छुट्टी की बहस से ट्रेन के टिकट की जुगत, जीने की इस व्यवस्था को किसने जन्म दिया ? कुछ राज्यों को छोड़ सभी राज्यों से युवा पलायन को मजबूर है, बहुत कम इतने सक्षम हो पाते की महानगर में अपने परिवार के साथ उन्नत जीवन यापन कर सके ; कितना कठिन जीवन बन जाता अपनी उम्र का एक बड़ा हिस्सा परिवारविहीन व्यतीत करना ; साल में एक बार अपने बूढ़े माँ बाप से मिलना ; अपने बच्चे के साथ समय बिताना ! एक गाना है मेरे हमसफ़र चलचित्र से “मर जाना बेहतर है परदेश में जीने से”  !!

रोजगार सिमट कर चंद शहरों तक रह जाये इसे कैसा विकास कहेंगे ; आज भी लाखों गाँव लाखों शहर विकास के नाम पर अपनी आत्मनिर्भरता माँगता है ; रोजगार के अवसर सबसे महत्वपूर्ण समस्या है पुरे देश के लिए ; पीढ़ी दर पीढ़ी इस पलायन के जंजाल में धँसते जा रहे ; बड़े महानगरों में भी जनसंख्या के विकेंद्रीकरण से कई समस्याएँ उतपन्न हो रही !

सरकार, समाज और स्वंय को चिंतन करना आवश्यक है की किस तरह आत्मनिर्भरता की ओर बढ़े ; हर पीढ़ी का पलायन हल नहीं है इस समस्या का ; हम शिक्षा में विविधता को चुने जिससे समग्र क्षेत्र में कार्य अवसर उतपन्न हो ! लघु उद्योग, ग्राम उद्योग, उद्योगों का विभिन्न राज्यों में संतुलित वितरण रोजगार के अवसर निर्मित करेंगे ! तकनीक एवं शिक्षा को सुधार कर स्वदेशी उत्पादन को हम और बढ़ावा दे सकते !

वास्तव में देश की प्रगति मानव संसाधनों के समुचित उपयोग से है ; बेरोजगारी अपराध को जन्म देती ; सरकार को युवाओं की रचनात्मकता के समुचित उपयोग के लिए उन्हें रोजगार में संग्लन करना होगा ! अनुदान, आरक्षण, सहायता की बजाय आत्मनिर्भरता को अपनायें, लोगों को सक्षम बनायें तभी देश सुदृढ़ होगा !

एक कविता है इसी संदर्भ में पढ़े

पलायन क्यों ??

(लेखक के अपने विचार है )

Sujit Kumar Lucky

Sujit Kumar Lucky – मेरी जन्मभूमी पतीत पावनी गंगा के पावन कछार पर अवश्थित शहर भागलपुर(बिहार ) .. अंग प्रदेश की भागीरथी से कालिंदी तट तक के सफर के बाद वर्तमान कर्मभूमि भागलपुर बिहार ! पेशे से डिजिटल मार्केटिंग प्रोफेशनल.. अपने विचारों में खोया रहने वाला एक सीधा संवेदनशील व्यक्ति हूँ. बस बहुरंगी जिन्दगी की कुछ रंगों को समेटे टूटे फूटे शब्दों में लिखता हूँ . “यादें ही यादें जुड़ती जा रही, हर रोज एक नया जिन्दगी का फलसफा, पीछे देखा तो एक कारवां सा बन गया ! : – सुजीत भारद्वाज

http://www.sujitkumar.in/

2 thoughts on “महानगर की ओर …”

  1. स्वंय का चिंतन करना आवश्यक है, आत्मनिर्भरता के लिए आत्मचिंतन आवश्यक है
    बहुत ही शानदार जानकारी है, धन्यवाद!

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