किस उल्फ्तों में खोये रहते हो ?

यहाँ जिंदगी से जी नहीं भरता,
तुम किस उल्फ्तों में खोये रहते हो !

उदास शाम में देखों लौटते चेहरों को,
सब आगोश है नींदों के ही इन पर छाये हुए !

इक कयास सा है मन में कुछ भूलने का,
या विवश है मन यादों में पल पल खोने का !

कुछ धुनें तलाश लेता कुछ पल गुनगुनाने को,
कहाँ दिखता कोई संगी साथी दो पल मुस्कुराने को !

विकल मन था चाह लिये बीते किस्से सब कह जाने का,
किस गुरुर में तुम खो गये किस्सा था तेरे अजनबी हो जाने का !

कितने ख्वाबों रातों को भुला नयी सुबह दबे पाँव आती,
कब जी भरता जी के जिंदगी, और किस उल्फ्तों में तुम खो गये !

#SK in Life Poetry ….

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