Night & Pen

कितना एकाकी है इस भागदौर में इंसान ?? – Thought with Night & Pen

कितना एकाकी है इस भागदौर में इंसान ; अनमने ढंग से सुबह में अपने आपको इस भीर के लिये तैयार करता हुआ !
महानगर की जिंदगी .. वक्त की कमी और ऊहापोह ने सब रिश्तों को बदल दिया है !

जिंदगी जीने की पूरी रुपरेखा तो बुन लेते, प्रोफेशनलिज्म में सराबोर करते जाते अपने आप को, और अपने आप को आगे स्थापित करने
की इसी होड़ में जीना ही भूल जाते; बनावटी जीवन में इस कदर शामिल होते की हमारी सादगी कहीं पीछे छुट जाती !
किसी का वो हँसमुख स्वाभाव, कोई व्यंग्य के लिये जाने वाला दोस्त ! अक्सर यही सुनते हुए मिल जाते तू यार बहुत बदल सा गया;
स्मार्टफोन चौबीसों घंटे पास रखते सोने से लेके उठने तक, रास्ते से लेके घर लौटने तक ; पर फोन बड़े होते गये और दिल छोटे ..
अपने अंदर ही इक घुटन की सीमा में बांधें मन को ना खुल के किसी से बातें करते, बस सोचते पुराने यादों को लेकिन खुद पहल नहीं करते,
हाँ कोई पहल भी कर ले आपकी जिंदगी की खोज खबर ले तो फिर वक्त की कमी निकल कर बच निकलते,
इक वहम में की कोई क्योँ किसी की जिंदगी में दिलचस्पी ले ! इक क्षद्म ही जिसे छुपाते .. अपनों के बीच जो ख़ुशी है,
एकाकी बन आप अपने समस्याओं में अपने आप को हतोत्साहित करते, आशा उम्मीद तो आपके आस पास किसी दोस्त के रूप में,
बुजुर्गो के रूप में, पर हम इस आधुनिक युग का निजी दायरा (प्राइवेट स्पेस) कहते जिसके बाहर की दुनिया से हम नदारद रहते !

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शायद ऐसा ही आप अपने आस पास भी महसूस करते होंगे .. इस कृत्रिम जीवन ने इस कदर जकड़ा है हमें की, हम जीना ही भूल गये !
कभी सोचा है की हम अपनी पूरी जिंदगी इक ही इंसान की इच्छाओं की पूर्ति में लगे रहते, इक ही इंसान की ख़ुशी के लिये पूरी जिंदगी सोचते,
और अंततः उस इक इंसान को भी पूर्ण संतुष्ट नहीं कर पाते .. वो अतुष्ट ही रहता और वो इक इंसान कौन है .. स्वंय हम !!

किसी की सुबह की ख़ुशी बनिए .. किसी रात में इक नाउम्मीद पथिक के लिये उम्मीद का सवेरा बनिए !

याद है “आनंद” चलचित्र का किरदार और ये संवाद “बाबु मोशाये जिंदगी लंबी नहीं बड़ी होनी चाहिए”.
चलिए जाते जाते जिंदगी गुनगुनाते है –
♫ जिंदगी कैसी है पहेली .. कभी ये हँसाए .. कभी ये रुलाये..
♫ इक दिन सपनों का राही चला जाये सपनों से आगे कहाँ ?

Sujit – A Thought with Night & Pen

Sujit Kumar Lucky

Sujit Kumar Lucky – मेरी जन्मभूमी पतीत पावनी गंगा के पावन कछार पर अवश्थित शहर भागलपुर(बिहार ) .. अंग प्रदेश की भागीरथी से कालिंदी तट तक के सफर के बाद वर्तमान कर्मभूमि भागलपुर बिहार ! पेशे से डिजिटल मार्केटिंग प्रोफेशनल.. अपने विचारों में खोया रहने वाला एक सीधा संवेदनशील व्यक्ति हूँ. बस बहुरंगी जिन्दगी की कुछ रंगों को समेटे टूटे फूटे शब्दों में लिखता हूँ . “यादें ही यादें जुड़ती जा रही, हर रोज एक नया जिन्दगी का फलसफा, पीछे देखा तो एक कारवां सा बन गया ! : – सुजीत भारद्वाज

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