भीड़ और मौत के सन्नाटे के बीच ..

एक सविंधान के  रक्षक को भीड़ इसलिए मार देती की वो अपने कर्तव्य को निभा रहा था, भीड़ और मौत के सन्नाटे के बीच न कुछ सवाल है न जवाब , न पक्ष है न विपक्ष बस है तो मौत का सन्नाटा ! कौन है हत्यारा ये समाज जिसके मन में विष ही विष है नफरत का धर्म का सत्ता का जाति का !

कुछ नारों पर कुछ गिरफ़्तारी होती, और होती कुछ धक्का मुक्की ! राष्ट्रवाद राष्ट्रद्रोह का शोर , अनेकों कैमरे और खबरों वाले दिग्गज निकालते है जुलुस जैसे सत्याग्रह का युग लौटा हो, क्योंकि आपके आवाज की स्वतंत्रता का हनन होता ! स्क्रीन काले हो जाते ! सियासत तुगलकी और लोग असहिष्णु हो जाते, फाड़े जाने लगती डिग्रियां और लौटाये जाने लगते सम्मान !

देखने समझने बोलने का शौक है तो आप परिदृश्य से वाकिफ हो गए होंगे, और ऐसी पुनरावृत्तियाँ होती रही उसके बाद, अभी फिर एक छोटी सी बात थी विभागीय छापे पर आपके बोलने की स्वतंत्रता का हनन हो जाता, निकल जाते आप सड़कों पर अपने अभिव्यक्ति की आजादी को पाने ! आप अभिव्यक्ति करते ही जातें करते ही रहते ये कौन सी अभिव्यक्ति है जो खुले में घूमती , खुले में बोलती , जो मन में आयी वो बोलती , बिना सिर पैर के बोलती, सबके बारे में बोलती, विशेष के बारें में बोलती, ये अभिव्यक्ति आरोप लगती प्रत्यारोप लगाती और फिर भी इसका हनन हो जाता !

अभिव्यक्ति की हनन हो भी जाती, आप बोल नहीं पाते लेकिन जिन्दा रहते लेकिन जब आपसे जिंदगी जीने के अधिकार का हनन हो जाता ! फिर ?? छीन लेती भीड़ आपसे आपकी जिंदगी जब आप कर्तव्य के पथ पर खड़े होते ! फिर ??

कोई सत्याग्रह नहीं , कोई स्वेत श्याम स्क्रीन , कोई काले झंडे , कोई मार्च , कोई न डिग्री फाड़ता न ही लौटाता अपने कोरे कविता के शब्दों के सम्मान को न ही कोई लौटाता अपने छद्म किरादरों से रचे कहानियों के बदले मिले उस यतार्थ पुरस्कार को ! कोई नहीं , कहीं कुछ भी नहीं खाली सड़क, सुना पसरा सन्नाटा मौत का !

आज अभिव्यक्ति की नहीं जीने के अधिकार का हनन हुआ, सविंधान की रक्षा में जिंदगी कुर्बान करने वाले रक्षक के जिस अधिकार को छीना गया और आप आज नहीं उतरे तो किस हक़ से उतरते है अभिव्यक्ति के हनन के लिए ! आपके पास तो जिंदगी है लड़ सकते अभिव्यक्ति के लिए लेकिन जिसके जीने को अधिकार को छीना गया वो ?

#SK

Post Author: Sujit Kumar Lucky

Sujit Kumar Lucky - मेरी जन्मभूमी पतीत पावनी गंगा के पावन कछार पर अवश्थित शहर भागलपुर(बिहार ) .. अंग प्रदेश की भागीरथी से कालिंदी तट तक के सफर के बाद वर्तमान कर्मभूमि भागलपुर बिहार ! पेशे से डिजिटल मार्केटिंग प्रोफेशनल.. अपने विचारों में खोया रहने वाला एक सीधा संवेदनशील व्यक्ति हूँ. बस बहुरंगी जिन्दगी की कुछ रंगों को समेटे टूटे फूटे शब्दों में लिखता हूँ . "यादें ही यादें जुड़ती जा रही, हर रोज एक नया जिन्दगी का फलसफा, पीछे देखा तो एक कारवां सा बन गया ! : - सुजीत भारद्वाज