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लालटेन युग – अंधकार से प्रकाश का एक सफर !

Lalten Villageआज वंडरलैंड से बातें नहीं; आज कुछ अतीत के पन्नों में चलते है ! एक दशक पूर्व .. नब्बे का दशक ; कोई टाइम मशीन नहीं शब्दों के माध्यम से चलते है लालटेन युग की ओर ! हम उस विकासशील दशक के वाहक है जिन्होंने लालटेन युग से निकलकर डिजिटल युग में प्रवेश किया है ! आज की पीढ़ी बचपन से फेसबुक ट्विटर की दुनिया से भले वाकिफ हो ! और कई पुरातन चीजें उनके समक्ष नहीं होगी ; पर हमने इस बदलाव के हर चरण को महसूस किया है ! पुरानी यादें भी साथ और नए ख्वाब भी सजते जा रहे है !

१९९२ – भारत का एक गाँव; पगडंडी वाली सड़कों के दोनों और घरों की श्रृंखला; सड़क से चौपाल, दहलीज और फिर आँगन यही प्रतिरूप था गाँव के हर घर का ! शाम होते ही दिन भर की धमाचौकड़ी के बाद, गोधूलि होते ही, एक चीज सामान नियत क्रम में हर घरों में निश्चित था, वो था लालटेन का जलना ! दूर तक जहाँ ये सीधी सड़क दिखती बस जुगनू के शोर और कुछ कुछ दुरी पर जलता लालटेन ! बच्चों के समूह में एक की जिम्मेदारी होती थी ; लालटेन में तेल भरके और जला के दरवाजे पर लाना ; इस हर शाम को आज के संदर्भ में बयाँ करना कुछ कौतुहल भरा हो, लेकिन एक अनुशाषन और व्यवस्थित जीवन की पौध यही से बढ़ी थी !

अगर आज के संदर्भ से सोचे तो मॉल कल्चर ; शाम तक बच्चे संगी साथी से लौटते अपने टीवी कार्यक्रम की लत में खो जाते; फिर मोबाइल मेसेज जैसे कार्यकलापों में शाम की दिनचर्या किसी नियत समय के अधीन नहीं होती ! पर वापस उस लालटेन युग की बात करें ; नियत समय पर लालटेन के चारों ओर घर के सारे बच्चे अपने अपने किताबों को ले, गोल घेरे में रोज बैठते थे; जोर जोर से कविता का पाठ “नहीं हुआ है अभी सवेरा, सूरज की लाली पहचान, चिड़ियों के उठने से पहले खाट छोर उठ गया किसान” किसी कक्षा की पाठ्यक्रम से झाँसी की रानी कविता “खूब लड़ी मर्दानी वो तो झाँसी वाली रानी थी” ! हर घर से इसी तरह कविता पाठ की आवाजें आती थी; वहीं चौपाल से दादा जी पुरानी कुर्सी पर बैठे सब बच्चों की कविताओं का आनंद लेते मंद मंद मुस्कुराते ! एक नियत अवधि तक पठन पाठन के बाद ही रात्रि भोजन का कार्यक्रम होता था !

आज भी लालटेन युग की यादें जीवंत है, आने वाली पीढ़ी तकनीक के नए नए आयामों में भले पठन पाठन करे, लेकिन लालटेन एक नियत दिनचर्या का घोतक है, समय के सदुपयोग, बच्चों में अनुशाषन, परस्पर सहयोग समभाव के साथ एक जगह सम्मिलित होकर ज्ञानार्जन एक अलग व्यक्तित्व का निर्माण करती ! और बचपन की इसी वयवस्था ने समय के संतुलन और व्यवस्थित जीवन शैली को अपने अंदर ढालना सिखाया !

आज लालटेन युग बीत चुका है, लेकिन प्रकाश से भरे सफर में इसकी रौशनी कभी मद्धम नहीं हुई है; ये एक सभ्यता सी लगती जिसका हम हिस्सा थे ! हम लालटेन को भूल जाये लेकिन शांयकाल की इस दिनचर्या को अपने बच्चों तक ले जाए ; ये प्रकाश का सफर अनवरत चलना चाहिए !

आप भी इसी भारतवर्ष के किसी न किसी गाँव शहर से इस लालटेन युग का हिस्सा बने होंगे ; अपने विचार साझा करे ! चलते है लालटेन को लेके आँगन बड़ी ताई अब भोजन लगा रही होगी !

शुभ रात्रि मित्रों ! – सुजीत

इसी संदर्भ में एक पुरानी कविता लिखी थी पढ़े  – लालटेन तले ….

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Sujit Kumar Lucky

Sujit Kumar Lucky – मेरी जन्मभूमी पतीत पावनी गंगा के पावन कछार पर अवश्थित शहर भागलपुर(बिहार ) .. अंग प्रदेश की भागीरथी से कालिंदी तट तक के सफर के बाद वर्तमान कर्मभूमि भागलपुर बिहार ! पेशे से डिजिटल मार्केटिंग प्रोफेशनल.. अपने विचारों में खोया रहने वाला एक सीधा संवेदनशील व्यक्ति हूँ. बस बहुरंगी जिन्दगी की कुछ रंगों को समेटे टूटे फूटे शब्दों में लिखता हूँ . “यादें ही यादें जुड़ती जा रही, हर रोज एक नया जिन्दगी का फलसफा, पीछे देखा तो एक कारवां सा बन गया ! : – सुजीत भारद्वाज

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