शहर शहर का दोपहर …

शहर शहर का दोपहर भी अलग ही होता, अपने शहर में रोज दोपहर होता था, रोज शाम और रोज सुबह !
महानगर की घड़ी में जरुर कुछ समस्या सी लगती ये अपने हिसाब से सुबह शाम कर लेती !
और कभी कभी कैलेंडर भी .. अनेकों सप्ताह बीत जाये तब इक दिन लगेगा अरे आज तो दोपहर भी हुई है !

वो पुराना दोपहर, अखबार को दुबारा पढ़ा जाने का सिलसिला शुरू होता था, हर इक पन्ने के हर इक खबर को,
“आज नेताजी ने इक पुल का उदघाटन किया”.. “बाढ़ के पानी में पुलिया बहा” .. “रोमांचक मुकाबले में हमारी टीम तीन रन से हारी”..”धोनी ने टाइटन से तीन करोड़ का करार किया” मतलब उसी दिन अखबार पुराना लगने लगता था, हर पन्ने ऐसे जैसे साढ़े तीन रूपये की असली कीमत वसूल हो चुकी ! आज कुछ पुराने अखबार मिले सिरहाने में, बंधे से थे किसी दिन सोच के लाया था की पढूंगा इसको, अखबार लेना रोजमर्रा है या उसे पढ़ना .. रोज चुपचाप अखबार वाला फ़ेंक जाता बालकोनी में, दफ्तर से आके उसे हम डाल देते इक जगह ढेर में,कुछ पंक्तियाँ लिखी थी कभी .. ये बड़े शहरों के अखबार क्या सोचते होंगे जब उसे नहीं पढ़ा जाता होगा,

” सीढियों पर पड़े अखबार बंधे से,
रोज वही मुरझा जाते पड़े पड़े,
शिकायत भरी नजर रहती,
क्यों ना लाके बिखेर देते सिरहाने,
हवायें जो पलट पलट दे उनके पन्ने,
खोल दे उनके बंधनों को … ” #SK (यूँ अखबार बंधे से परे रहते !)

summer-afternoon

यहाँ का दोपहर उदास सा है, खिड़कियाँ आधी खुली आधी बंद, कभी आते जाते देख लो कई अजनबी गुजरता हुआ दिख जायेगा,
फिर बिस्तरों पर आधी नींद के कई दिनों की किश्तें अदा करने लगते.. दोपहर और रात दोनों ही इक जैसे ही होते सन्नाटे और सुकून जैसा, बस उजालों का फर्क है,गर्मियों के दोपहर मैं सब दोस्तों के साथ रेडियो सुनने की इक अलग यादें थी, “विविध भारती” के पुराने गाने; ये और मनोरंजक हो जाता था शनिवार को, इस दिन आता था शो आपकी फारमाइश.. इस गाने की फारमाइश की है टिंकू, बिट्टू, चिंटू और उसके दोस्तों ने जिला अररिया से !
तो पेश है किशोर दा के आवाज में – “चला जाता हूँ किसी की धुन में धड़कते दिल के तराने लिये, मिलन की मस्ती भरी आँखों में, हजारों सपने सुहाने लिये” रेडियो उदघोषक दूर गाँव शहरों, खेतों खलिहानों तक लोगों को अपनी आवाज में बाँध लेता था ! कहीं ना कहीं इक साथ रेडियो के उस गाने में डूब जाना हमे साथ लाता था, अब सब के दोपहर के अपने धुन अपने तराने है !

किसी दोपहर पर गुलज़ार साहब लिखते है ..

” दुपहरे ऐसी लगती है , बिना मोहरों के खाली खाने रखे है ,
न कोई खेलने वाला है बाजी , और न कोई चाल चलता है ”

तो शहर शहर का दोपहर मैं .. आप क्या सोचते ??

~ सुजीत

Photo Credit : http://gracefullanding.blogspot.in

 

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