तलाशता हूँ वो कमी – Some Memoirs On Father’s Day !!

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सतत प्रयत्न बेमानी सा है आज,
अर्थहीन सफलता का बोझ कैसा,
मेरा मकाँ पर अब जंजीरें और ताले है !

ईटों गारों से भी आगे कुछ लगा था,
आपके सपनों का वो मकाँ,
धूलों जालों में गर्द है दीवारें,
मुरझा गयी आपके हाथों की लगाई तुलसी !

दीवाली पर हाथों में कुछ दीये लेकर,
मैंने दीवारों के पास रख दिये थे ऐसे,
जलना रात भर चमक से मुँह फेर,
बिना उल्लास के पर्व कैसा होगा !

कभी मैं जब आता हूँ घर हर बार,
आपके दफ्तर के सामने से होकर गुजरता,
जहाँ हर सुबह छोड़ने जाता था आपको,
उसी रास्ते से लौट के धीमे धीमे आता,
यादों को महसूस करता पीछे पीछे आते हुए !

पुनर्वत जीवन में सब गतिमान है,
सिवाय मेरे उस स्तब्ध मन के,
जहाँ मैं कोसता हूँ सृष्टि के नियमों को,
वियोग जो अब चेहरे पर उभर नहीं पाते !

पुराने धरोहरों पर मैं गया था कई दफा,
सीख लिया है मैंने परम्पराओं का सम्मान,
लाल स्याही की कमी में सबने विजाती कर दिया उन्हें,
अब में पाषाण हृदय से कुछ दूर रहता हूँ,
ममता का उचाट चेहरा देख नहीं पाता !

ना रोक टोक, ना डांटता ही कोई अब,
ऊँगली छुट गयी मैं जो चले लगा अपने कदमों से,
अब भी कठिन डगर पर तलाशता हूँ वो कमी !

मैं अक्षम अकिंचन कुछ दे ना सका..

आपने कर्मों में रह जग से लड़ना सीखा दिया,
जैसे आप ने इस जग में जीना सीखा दिया !

Above Few Words For My Father – He didn’t tell me how to live; he lived, and let me watch him do it… wherever you are, you will never be forgotten…

#Sujit