यूँ अखबार बंधे से परे रहते !

Unread Newspaper at Balcony

सीढियों पर पड़े अखबार बंधे से,
रोज वही मुरझा जाते परे परे,
शिकायत भरी नजर रहती,
क्यों ना लाके बिखेर देते सिरहाने,
हवायें जो पलट पलट दे उनके पन्ने,
खोल दे उनके बंधनों को …
उन्हें भी मिलता था सुकून,
जब बचपन में छिना झपटी में,
लेके भागते थे हर किस्सों को उनकी,
और कभी कभी होती थी ,
इन्तेजार भी अपनी बारी आने की,
वो किस्से कहानियाँ को सहेज जाती थी नजरे,
आज मुँह मोड़ा हर पन्नों से तुम्हारे,
दिखती है मुझे हर किनारों पर बड़ी तस्वीरे बस,
नाचते गाते लोगो की, और बदलते कपड़े की कहानी,
या होती है एक बड़ी गाड़ी की जगमगाती रौशनी,
नहीं होती वक्त की सच्ची तस्वीरे अब अख़बारों में,
बस उन्हें छोर देता बंधे से वही …
खबरों का ढेर मन का बोझ तो नही बने ! !
@Lucky

Post Author: Sujit Kumar Lucky

Sujit Kumar Lucky - मेरी जन्मभूमी पतीत पावनी गंगा के पावन कछार पर अवश्थित शहर भागलपुर(बिहार ) .. अंग प्रदेश की भागीरथी से कालिंदी तट तक के सफर के बाद वर्तमान कर्मभूमि भागलपुर बिहार ! पेशे से डिजिटल मार्केटिंग प्रोफेशनल.. अपने विचारों में खोया रहने वाला एक सीधा संवेदनशील व्यक्ति हूँ. बस बहुरंगी जिन्दगी की कुछ रंगों को समेटे टूटे फूटे शब्दों में लिखता हूँ . "यादें ही यादें जुड़ती जा रही, हर रोज एक नया जिन्दगी का फलसफा, पीछे देखा तो एक कारवां सा बन गया ! : - सुजीत भारद्वाज

1 thought on “यूँ अखबार बंधे से परे रहते !

    […] ” सीढियों पर पड़े अखबार बंधे से, रोज वही मुरझा जाते पड़े पड़े, शिकायत भरी नजर रहती, क्यों ना लाके बिखेर देते सिरहाने, हवायें जो पलट पलट दे उनके पन्ने, खोल दे उनके बंधनों को … ” #SK (यूँ अखबार बंधे से परे रहते !) […]

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