Summer Leaves Poem

बिखरे पत्ते …

Summer Leaves Poemधूप चढ़ती हुई रोज …
सूखे पत्ते टूट कर बिखरे बिखरे,
जैसे कोई कह गया हो,
अलविदा पुराने रिश्तों को ।

बदलते मौसम के साथ …
खो रही नमी भी मन से,
अब उजाड़ से तपते दिन होंगे,
और होगी मायूसी से ऊँघते दोपहर ।

दिन ढल रहा है…
बिखरे पत्तों को निहारता,
टूटे मन को सम्भालता,
निकल पड़ा है राही ,
शाम की आगोश में सुकून को तलाशने ।

#SK

Post Author: Sujit Kumar Lucky

Sujit Kumar Lucky - मेरी जन्मभूमी पतीत पावनी गंगा के पावन कछार पर अवश्थित शहर भागलपुर(बिहार ) .. अंग प्रदेश की भागीरथी से कालिंदी तट तक के सफर के बाद वर्तमान कर्मभूमि भागलपुर बिहार ! पेशे से डिजिटल मार्केटिंग प्रोफेशनल.. अपने विचारों में खोया रहने वाला एक सीधा संवेदनशील व्यक्ति हूँ. बस बहुरंगी जिन्दगी की कुछ रंगों को समेटे टूटे फूटे शब्दों में लिखता हूँ . "यादें ही यादें जुड़ती जा रही, हर रोज एक नया जिन्दगी का फलसफा, पीछे देखा तो एक कारवां सा बन गया ! : - सुजीत भारद्वाज