no mad
Poetry

खानाबदोश….

no madअलग अलग मंजिलों पर रहता मैं,
कभी जिंदगी की तन्हाई तलाशने,
ऊपर छत पर एक कमरा है,
पुराना रेडियो पुरानी कुर्सी,
और धूल लगी हुई कई तस्वीरें,
जिंदगी से ऊब कर बैठता जा मैं उस मंजिल पर,
कभी तलघर वाली मंजिल पर चला जाता,
मकड़ी के जालों में सर घुसा ढूँढता हूँ बचपन की चीजें,
बांकी अलग अलग मंजिल पर अलग अलग जिंदगी है,
किसी मंजिल पर बच्चें है,
किसी मंजिल पर बहू रहती,
किसी मंजिल पर माँ बाबूजी,
मैं किस मंजिल की ओर चला था,
अब किसी मंजिल पर कहीं रह लेता हूँ,
उम्र दर उम्र बदलते रिश्तें बदलती मंजिल,
सोचा था एक ही मंजिल पर उम्र कट जाती तो,
एक बुकशेल्फ बनवाता खूब सारे किताबें भर देता,
अब हर मंजिल पर कुछ किताबें छूट जाती ,
कुछ किताबों को मैं समेट कर किसी मंजिल पर ले के जाता,
पता नहीं कोई स्थाई ठिकाना न हो तो उसे खानाबदोश ही कहते है,
उम्र का हर एक पड़ाव मंजिल बदल देता,
अलग अलग मंजिलों पर रह जिंदगी खानाबदोश सी है |

#SK

Sujit Kumar Lucky
Sujit Kumar Lucky - मेरी जन्मभूमी पतीत पावनी गंगा के पावन कछार पर अवश्थित शहर भागलपुर(बिहार ) .. अंग प्रदेश की भागीरथी से कालिंदी तट तक के सफर के बाद वर्तमान कर्मभूमि भागलपुर बिहार ! पेशे से डिजिटल मार्केटिंग प्रोफेशनल.. अपने विचारों में खोया रहने वाला एक सीधा संवेदनशील व्यक्ति हूँ. बस बहुरंगी जिन्दगी की कुछ रंगों को समेटे टूटे फूटे शब्दों में लिखता हूँ . "यादें ही यादें जुड़ती जा रही, हर रोज एक नया जिन्दगी का फलसफा, पीछे देखा तो एक कारवां सा बन गया ! : - सुजीत भारद्वाज
http://www.sujitkumar.in/