अनवरत यूँ ही रोज चलते है !

सुबह किस सफर पर फिर चले,
फिर किसी शाम को आज ले लौटे;
ना कहीं पँहुचते है ना बढते है;
बस अनवरत यूँ ही रोज चलते है !

 

कुछ हसरतों को रोज कुचलते है,
कुछ उम्मीदों से यूँ ही रोज जगते है,
है रात ये कितनी बड़ी सी लगती है,
यादों के फेहरिस्त से जो रोज मिलते है !

 

मेरा सफर ही मालूम नहीं मुझकों,
दो कदम भटक कर फिर उसी राह पर चलते है,
ये पड़ाव जिसे मंजिल हम समझते है,
वो राहगीर जिसे हमसफर हम समझते है,
टूट जाता है वहम हर कदम मेरा,
जब मेरे राहों में छोर वो जब निकलते है,
जब रूबरू होते है खुद से,
ये कदम खुद ही खुद मेरे उठते है,
बस अनवरत यूँ ही रोज चलते है !

— #SK —

sk-poetry

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