अनवरत यूँ ही रोज चलते है !

सुबह किस सफर पर फिर चले,
फिर किसी शाम को आज ले लौटे;
ना कहीं पँहुचते है ना बढते है;
बस अनवरत यूँ ही रोज चलते है !

 

कुछ हसरतों को रोज कुचलते है,
कुछ उम्मीदों से यूँ ही रोज जगते है,
है रात ये कितनी बड़ी सी लगती है,
यादों के फेहरिस्त से जो रोज मिलते है !

 

मेरा सफर ही मालूम नहीं मुझकों,
दो कदम भटक कर फिर उसी राह पर चलते है,
ये पड़ाव जिसे मंजिल हम समझते है,
वो राहगीर जिसे हमसफर हम समझते है,
टूट जाता है वहम हर कदम मेरा,
जब मेरे राहों में छोर वो जब निकलते है,
जब रूबरू होते है खुद से,
ये कदम खुद ही खुद मेरे उठते है,
बस अनवरत यूँ ही रोज चलते है !

— #SK —

sk-poetry

Post Author: Sujit Kumar Lucky

Sujit Kumar Lucky - मेरी जन्मभूमी पतीत पावनी गंगा के पावन कछार पर अवश्थित शहर भागलपुर(बिहार ) .. अंग प्रदेश की भागीरथी से कालिंदी तट तक के सफर के बाद वर्तमान कर्मभूमि भागलपुर बिहार ! पेशे से डिजिटल मार्केटिंग प्रोफेशनल.. अपने विचारों में खोया रहने वाला एक सीधा संवेदनशील व्यक्ति हूँ. बस बहुरंगी जिन्दगी की कुछ रंगों को समेटे टूटे फूटे शब्दों में लिखता हूँ . "यादें ही यादें जुड़ती जा रही, हर रोज एक नया जिन्दगी का फलसफा, पीछे देखा तो एक कारवां सा बन गया ! : - सुजीत भारद्वाज

1 thought on “अनवरत यूँ ही रोज चलते है !

    ambuj

    (April 3, 2014 - 6:06 pm)

    see this blog

Comments are closed.