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जिंदगी अपनी है सवाल भी अपने – Outside Your Comfort Zone

कुछ संदेह मन में .. कुछ स्थायित्व की कमी यूँ तो लगता जैसे एक दोष हो जिंदगी के लिये !
पर एक गहराई से देखे तो हमारी जिंदगी को यही संदेह और स्थायित्व की कमी रफ़्तार देते ;
देते एक उम्मीद चलने की, एक हौसला आगे बढ़ने की !

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विस्तृत रूप में देखे और सोचे तो स्थायित्व एक बंधन सा है.. अक्सर हम इसे देखते अपने जिंदगी में,
रोजमर्रा की बात हो या शिक्षा रोजगार में संलग्न निहित हमारे प्रयास ! स्थायित्व हमें रचनात्मक होने से रोकता,
एक ही पुनरावृत्ति कार्यों की, आदतों की या अन्य घटनाक्रमों की हमें साधारण कर जाती !
और फिर कभी जब हमें अहसास होता की वक्त बीत गया और हम साधारण ही होते चले गये;
कुछ अफ़सोस कुछ ग्लानि होता ! ज्ञान, रोजगार, व्यपार में स्थायित्व को खोजे हम लेकिन प्रगतिशील,
रचनात्मक तत्वों को भी अपने अंदर लगातार विकसित करते रहे क्योंकि बदलते वक्त के प्रवाह से आपका विकास
अवरुद्ध ना हो ! यही बात संदेह से भी संबंधित है .. कहीं ना कहीं अपने अंदर एक कोना संदेह का हमें अपने कार्यों को
गंभीरता से करने के लिये प्रेरित करता; और ये संदेह अंदर उठने वाले अभिमान को भी नियंत्रित करता;
सफलता उत्साहित करती .. लेकिन मन में छुपा संदेह सफलता को जारी रखने की उर्जा का वाहक होता !
यह बातें हर व्यक्ति के नजरिये से भी निहित है हम इसके किस पक्ष को किस तरह उजागर करते !

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ऐसे अंग्रेजी में यदा कदा वर्कप्लेस में ये बातें सुनने को मिल ही जाती .. शायद सही भी है इस प्रतिस्पर्धी समय के लिये
“Come out From Comfort Zone, Insecurities Keeps Us Moving, Don’t Relax, Casual Approach, Sincerity etc. “……

अपने आप को टटोलते रहना जरुरी है इस जिंदगी से कदम मिला के चलने के लिये !
कुछ ऐसी बातों के साथ फिर आयेंगे .. जिंदगी अपनी है सवाल भी अपने खुद चिंतन कर सकते आप ..

..एक किशोर कुमार के गाने साथ छोरे जा रहे ..
♫ जब दर्द नहीं था सीने में ;
क्या खाक मजा था जीने में.. ♫

At the end of this random thought sharing an infographics about comfort zone.

This Infographic was produced by WhatismyComfortZone.com

Random Thoughts & Views : – सुजीत कुमार

Sujit Kumar Lucky

Sujit Kumar Lucky – मेरी जन्मभूमी पतीत पावनी गंगा के पावन कछार पर अवश्थित शहर भागलपुर(बिहार ) .. अंग प्रदेश की भागीरथी से कालिंदी तट तक के सफर के बाद वर्तमान कर्मभूमि भागलपुर बिहार ! पेशे से डिजिटल मार्केटिंग प्रोफेशनल.. अपने विचारों में खोया रहने वाला एक सीधा संवेदनशील व्यक्ति हूँ. बस बहुरंगी जिन्दगी की कुछ रंगों को समेटे टूटे फूटे शब्दों में लिखता हूँ . “यादें ही यादें जुड़ती जा रही, हर रोज एक नया जिन्दगी का फलसफा, पीछे देखा तो एक कारवां सा बन गया ! : – सुजीत भारद्वाज

http://www.sujitkumar.in/

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