कभी आते नहीं – The Contrast of Life !!

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गाँव में ख्वाब पुरे होते नहीं,
शहरों में नींद कभी आते नहीं !

फोन इतने बड़े हाथों में आते नहीं,
बात दिलो तक अब जाते नहीं !

चुप से सुनते हरदम पुराने धुनों को,
अब कभी खुल के यूँ गुनगुनाते नहीं !

चलते फिरते पांवों के छालें दिखते नहीं,
अब घासों पर भी दो कदम चल पाते नहीं !

लंबी लंबी घने हरे पेड़ थे कितने,
अब गमलों में भी बोनसाई मुरझाते नहीं !

कभी फूसों छप्परों में रह जाते थे संजीदा,
ऊँचे दीवारों और छतों में भी बस पाते नहीं !

करते थे वादें कैसी कैसी लंबी,
फिर कभी लौट के वो आते नहीं !

कैसे खिलखिलाते थे नोक झोंक पर भी,
अब बीत जाती उत्सव सभी फिर भी मुस्कुराते नहीं !

रो जाते थे छोटी सी किसी बातों पर,
अब अंदर की बेचैनी कभी कुछ बताते नहीं !

घंटों बीत जाती थी कितनी बातों में तभी,
अब शब्दों के सहारें लेकर कुछ भी छुपाते नहीं !

Sujit ~ The Contrast of Life

Image Credit : http://fineartamerica.com/ 

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