एक गुड़िया परायी -२

बचपन की निश्छल अल्हरता को,
को कभी झुँझलाहट बनते देखा !

जो खुल के भी कभी रोते थे,
उसे चुप हो के सिसकते देखा !

किसी आँगन में जो खेला करती,
उन खाली पाँवों में पायल को बँधते देखा !

उस दुपहर में जिद कर कितनी
कभी उस आँचल में सिर रख सोती !
आज भरी दुपहरी बीती ..
बीती पहर अब तक बस कंठ भिगोते देखा !

थे साथ संग तो इक रिश्ता,
अब आयाम वो मुश्किल था,
बेमन से जाते हाथ छुरा के,
हमने ना कभी उन्हें है देखा !

किसी द्वंद में जब खामोश पड़े,
खुद राहों को चुनते उसे है देखा !

उम्र पड़ाव की दहलीजों पर,
जीवन को बदलते देखा !

प्रणय प्यार के बंधन को,
नियती से बिखरते देखा,
काँच के कुछ टुकड़ों पर,
लाल रंग को मिटते देखा !

कभी रिश्तों ने किया दूर उसे,
कभी खुद रिश्तों से दूर परे,
जीवन की किसी पड़ाव पर आके,
गुड़िया को फिर परायी बनते है देखा !

(इस कविता का प्रथम भाग – ‘एक गुड़िया परायी‘ )

: – सुजीत कुमार

gudia-part-2

2 thoughts on “एक गुड़िया परायी -२

  1. Pingback: एक गुड़िया परायी होती है | Sujit Kumar Lucky

  2. gyanipandit

    एक गुड़िया परायी – 2 कविता बहुत ही बढ़िया, आखीर की कुछ पंक्तिया काफी अच्छी हैं.

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