Poetry

एक गुड़िया परायी -२

बचपन की निश्छल अल्हरता को, को कभी झुँझलाहट बनते देखा ! जो खुल के भी कभी रोते थे, उसे चुप हो के सिसकते देखा ! किसी आँगन में जो खेला करती, उन खाली पाँवों में पायल को बँधते देखा ! उस दुपहर में जिद कर कितनी कभी उस आँचल में सिर रख सोती ! आज […]

Poetry

अल्ल्हर बातें !

एक अल्ल्हर बातें है जैसे, सपने का पलना हो जैसे !अठखेली हवाओं जैसी !बावरी मन चंचल हो जैसी ! आशाओं की डोरी सी !बातें करती पहेली सी, एक तस्वीर …. ख्वाबो में एक तस्वीर सी बनती,हया धड़कन के पहलु में छुपती,झुकी नजर में शर्माती हँसती,नाजुक मन आँखों में सिमटी ! एक ख्वाब …कभी इन्तेजार में […]