जिंदगी आखिर जिंदगी ही है..

एक संगीत कभी सुमधुर तानो भरा,
कभी अनसुना विस्मित रागों सना !

एक हँसी कभी खुशी लहरों भरा,
कभी व्यंग्य के उपहासो से जना !

एक क्रंदन कभी नयनों में भरा !
कभी रुदन आद्र मन में बना !

एक ख्वाब कभी पलकों में भरा,
कभी वह पतझर पंछी बन उड़ा !

सवाल ख़ामोशी के साया में परा,
राहों में उलझे, पग पग पर है पाषाण जड़ा !

तूफां और नाकामी, मंजिल पर खड़ा !
कब डरा, कब रुका .. ??
जिंदगी आखिर जिंदगी, तेरे संग मैं चला !

सुजीत भारद्वाज

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