winter poem

धुंध में अजनबी

winter poemधुंध के दोनों पार बैठे हम
वहम भी है होने का और नहीं भी
तुम भी बोलते कभी कभी
कभी कभी कुछ मैं भी कहता हूँ
धुंध में खोये दो अजनबी से
ओस की चादर के उस ओर
से इस पार खींच पाता तो
एक गर्माहट सी होती रिश्तों की !

ये धुंध भी न एक अहं है
रोके रखता है दोनों पार
दो अजनबियों को !!

#SK

Post Author: Sujit Kumar Lucky

Sujit Kumar Lucky - मेरी जन्मभूमी पतीत पावनी गंगा के पावन कछार पर अवश्थित शहर भागलपुर(बिहार ) .. अंग प्रदेश की भागीरथी से कालिंदी तट तक के सफर के बाद वर्तमान कर्मभूमि भागलपुर बिहार ! पेशे से डिजिटल मार्केटिंग प्रोफेशनल.. अपने विचारों में खोया रहने वाला एक सीधा संवेदनशील व्यक्ति हूँ. बस बहुरंगी जिन्दगी की कुछ रंगों को समेटे टूटे फूटे शब्दों में लिखता हूँ . "यादें ही यादें जुड़ती जा रही, हर रोज एक नया जिन्दगी का फलसफा, पीछे देखा तो एक कारवां सा बन गया ! : - सुजीत भारद्वाज