Poetry

कई महीनों बंद रहता वो मकां

old-house

कई महीनों बंद रहता वो मकां,
मेहमान नवाजी अब नहीं होती वहाँ !

रुक के आते जाते सब देखते थे,
कोई खैर पूछता दिख जाता था,
अब आते जाते लोग मायूसी से,
सर झुकाये निकल जाते है,
कई महीनों जो बंद रहता है वो मकां !

कई ठोकरों पर खुल पाती,
लटकते ताले दरवाजों से,
शायद कभी देखा हो किसी ने,
जंजीरों को लटकते इन दरवाजों पर,
अब कई महीनों बंद रहता वो मकां !

हवायें ले आती थी धुल और सुखी पत्तियाँ,
रोज सुबह बड़े जतन से हर कोना साफ़ होता था,
अब मकरी की जालियाँ हर कोने में बन आती,
धूलों की आँधियों से फर्श ढक जातें है,
जिन सीढियों के स्तंभों पर हाथ रख चलते थे बच्चे,
आज बेलें सर्प सी लिपट गयी है चारों ओर,
अब कई महीनों बंद रहता वो मकां !

छत पर रोज जल जाती थी गोधुली की दीपें,
अब आँगन की तुलसी मुरझाई हुई है,
कभी शोर सुनाई पड़ता है कमरों में,
परदे हट जातें है खिड़कियों से,
जान परता कोई आया होगा लौट के,
फिर वही सन्नाटा पसर जाता कुछ दिनों में,
अब कई महीनों बंद रहता वो मकां !

सुजीत

Sujit Kumar Lucky

Sujit Kumar Lucky – मेरी जन्मभूमी पतीत पावनी गंगा के पावन कछार पर अवश्थित शहर भागलपुर(बिहार ) .. अंग प्रदेश की भागीरथी से कालिंदी तट तक के सफर के बाद वर्तमान कर्मभूमि भागलपुर बिहार ! पेशे से डिजिटल मार्केटिंग प्रोफेशनल.. अपने विचारों में खोया रहने वाला एक सीधा संवेदनशील व्यक्ति हूँ. बस बहुरंगी जिन्दगी की कुछ रंगों को समेटे टूटे फूटे शब्दों में लिखता हूँ . “यादें ही यादें जुड़ती जा रही, हर रोज एक नया जिन्दगी का फलसफा, पीछे देखा तो एक कारवां सा बन गया ! : – सुजीत भारद्वाज

http://www.sujitkumar.in/

3 thoughts on “कई महीनों बंद रहता वो मकां”

  1. छत पर रोज जल जाती थी गोधुली की दीपें,
    अब आँगन की तुलसी मुरझाई हुई है..
    bahut khoobsurat hai

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