evening view poetry

बीतते दिन का मंजर …

evening view poetryबीतते दिन का मंजर ऐसा है ,
जैसे उम्र पतझड़ सी जिंदगी ।

बोझिल मन ऐसा होता,
जैसे शाम उतर आयी हो सीने में ।

झुरमुटों में कैद दिन का सूरज,
ढल रहा है छितिज की सीमा पर ।

दिन का शबाब खत्म हो कर,
अब धुंधली हो चली शाम सी ।

रोज ढलता रोज ही डूबता,
जैसे मन में दब जाती कई हसरतें ।

फिर अंधेरे की कसमसाहट आतुर,
और दिल के सन्नाटे में कुछ गुबार भी ।

शाम की दस्तक यतार्थ है,
फिर सुबह होगी, सुबह होगी ।

~ Sujit

Post Author: Sujit Kumar Lucky

Sujit Kumar Lucky - मेरी जन्मभूमी पतीत पावनी गंगा के पावन कछार पर अवश्थित शहर भागलपुर(बिहार ) .. अंग प्रदेश की भागीरथी से कालिंदी तट तक के सफर के बाद वर्तमान कर्मभूमि भागलपुर बिहार ! पेशे से डिजिटल मार्केटिंग प्रोफेशनल.. अपने विचारों में खोया रहने वाला एक सीधा संवेदनशील व्यक्ति हूँ. बस बहुरंगी जिन्दगी की कुछ रंगों को समेटे टूटे फूटे शब्दों में लिखता हूँ . "यादें ही यादें जुड़ती जा रही, हर रोज एक नया जिन्दगी का फलसफा, पीछे देखा तो एक कारवां सा बन गया ! : - सुजीत भारद्वाज