indian summer poem

निर्जन मन …


आजकल का मौसम, दिन भर जलती हुई पछिया हवा, निर्जन सड़के, चिलचिलाती धुप, बेजार मन ! एक कविता इसी संदर्भ में …

indian summer poemसड़कों पर रेगिस्तान उतर आया है,
पछिया बयार का तूफ़ान उतर आया है !

सूखे पत्तों से,
भर गई है गलियाँ और मुंडेरे,
धूलों का आसमान उतर आया है !

परदे आपस में उलझ गए है ऐसे,
जैसे किसी ने गाँठे बांध दी हो,
निर्जन राह और जलता आसमान,
तपती मौसम का पैगाम उतर आया है !

सुख गए है कूप और तालाब,
शुष्क धरा पर शैतान उतर आया है !

कैसे चुपचाप सी खामोश है दुपहरी,
उजड़े मन का कोई मेहमान उतर आया है !

#SK

9 thoughts on “निर्जन मन …

  1. Amit Shukla

    एक अदद अंदाज़ में लिखे गए है ये शब्द सारे,
    लगता है मरुस्थल में कोई नई बयार लाया है.

    – अमित शुक्ला

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