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“जय हो” रहमान ~ जन्मदिन मुबारक !

A-R-Rahman-Gem-Of-Music-2013-500x500चंदा को एक गीत बुलाती है कहती है – “चंदा रे चंदा रे कभी तो जमीं पर आ बैठेंगे बातें करेंगे”
इश्क़ को कभी चखा है ? “गुड से भी मीठा इश्क इश्क तो इमली से खट्टा इश्क इश्क है ” इस इश्क के बिना किया जीना यारों !
और दिल कभी टूटे तो ऐसा लगता “इस टूटे दिल की पीर सही न जाये” ! और इसी टूटे दिल से जब आह निकलती “दिल से रे ..” ;
मन मेरा जब सूफियाना हो जाता तब झूम के जाता “ख्वाजा मेरे ख्वाजा दिल में समा जा” … “पिया हाजी अली”
मेरी मिटटी जब मुझे बुलाती तो मन में गूँजता ” ये जो देश है तेरा, स्वदेश है तेरा” !
राधा कैसे न जले इसका भी कारण वो बताते है !

इश्क़ जैसे सजदा यार का और तब बस ये ही धुन निकलती ”
“वो यार है जो खुश्बू की तरह
जिसकी ज़ुबान उर्दू की तरह
मेरी शाम रात मेरी कायनात
वो यार मेरा सैंया सैंया ,
तावीज़ बनाके पहनूं उसे
आयात की तरह मिल जाए कहीं ”
और मेरा जिया जब जब जलता तब रात भर धुआँ उठता “जिया जले जां जले नैनो तले, रात भर धुआँ जले” !
सूखे से आँखों में मेघा को बरसाते “बरसों रे मेघा बरसों” !!

और सजनी को कहता ” तेरे बिना बेस्वादि बेस्वादि रतियाँ …. ओ हमदम बिन तेरे क्या है जीना” !
और मैं अपने धरती को नमन करता तो रोम रोम में ” माँ तुझे सलाम … वन्दे मातरम ” भर जाता !
कभी खुद से सवाल करता “रे कबीरा मान जा, रे फकीरा मान जा … कैसा तू है निर्मोही ? कैसी तेरी खुदगर्जी ? ”
अपने मितवा से पूछता “मेरे मन ये बता दे तूँ किस ओर चला है तूँ … मितवा कहे धड़कने तुझसे क्या ? ”
भटकते भटकते जब दूर कहीं निकल जाते तब उनको कोई बुलाता है “ओ नादान परिंदे घर आजा…..”
और फिर उड़ने को जी चाहता “मिटटी जैसे सपने कित्ता भी झारो फिर आ जाते है ..फिर से उड़ चला है तूँ” !

“जय हो” रहमान ! जिनके रग रग में संगीत बहता हो वो है रहमान !

जन्मदिन मुबारक !!

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गुरुदत्त – हिंदी सिनेमा का एक कवि …

उसकी जिंदगी में कशमकश था, नाम शोहरत पैसा भी जिसके लिए बेमानी था । वो प्यासा रहा जिंदगी भर प्यार के लिए, रिश्तों के लिए, अपने जूनून को लोगों तक पहुँचाने के लिए । कहते है महान कलाकृति और कला को असली पहचान मौत के बाद ही  मिलती। जिसे हम नकार देते नजरों के सामने होते हुए भी नजर से ओझल होने पर वही चीज अनमोल हो जाती ।

एक ऐसे ही कलाकार जो कालजयी हो गया आज उसके ही याद में कुछ लम्हें उनसे जुड़े । वो नृत्य में पारंगत था, समीक्षक था, निर्देशक था, कवि था, गायक था, चित्रकार था, फोटोग्राफर था कला के प्रति दीवानगी रग रग में ! हमेशा कुछ अलग करने की कोशिश दूरदर्शी कलाकार जो वक़्त से आगे की सोचता था, उसके लिए सिनेमा बस शोहरत और प्रसिद्धि पाने का जरिया नहीं था; सिनेमा को उसने अपना जीवन दिया था !

आज उनके जन्मदिवस पर, एक महानायक की याद में उनसे जुड़ी बातें ~ हम बात कर रहे गुरुदत्त की ; शायद आजकल के युवा ब्लैक एंड वाइट बॉयोस्कोप के इस महान कलाकार को नहीं जानते पर वो फिल्म जगत के लिए आदर्श रहें है ! वो क्यों थे अलग “उनकी अपनी अलग शैली थी, वो बहुत ही छोटी चीजों को भी अपने सिनेमा का अहम हिस्सा मानते थे, सहकलाकार हो या, गीत के बोल, लाइट, पर्दे, दृश्य संवाद, अभिनय सभी को वो जीवंत कर देते थे ! हिंदी क्लासिक सिनेमा को नया आयाम देने में उनका महत्वपूर्ण स्थान है !

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* कौन थे गुरुदत्त *

वसंत कुमार शिवशंकर पादुकोण गुरुदत्त के नाम से जाने गये ;  भारतीय फिल्म जगत के जाने माने डायरेक्टर, प्रोडूयसर, एक्टर ! अपने क्लासिक सिनेमा के लिए जाने गये ; ९ जुलाई १९२५ में जन्म ! कलकत्ता, बैंगलोर, अल्मोड़ा, पुणे, मुंबई के इर्द गिर्द बीता उनका जीवन ! जानी मानी गायिका गीता दत्त से विवाह और तीन बच्चे (अरुण, तरुण, नीना ) !

गुरुदत्त के साथी : अबरार अल्वी, राज खोसला, वीके मूर्ति, वहीदा रहमान, जॉनी वॉकर, रहमान, गीता दत्त, मोहम्मद रफ़ी, ओपी नैयर, एसडीबर्मन, हेमंत कुमार, देवा नन्द.
हम नहीं भूल सकते “साहिर लुधयानवी” और “कैफ़ी आज़मी” जिनके नज्मों और शब्दों ने गुरुदत्त के गानों को अमर कर दिया !

क्यों थे गुरुदत्त अलग
– उन्होंने कभी पैसे और नाम के लिए सिनेमा नहीं बनाया ; हमेशा कुछ नया करने का जोखिम लिया “कागज़ के फूल में अपने नाकामी को याद करके कहते ; जिंदगी में हम या तो सफल होते या असफल” !
–  उनके साथी कलाकार कहते वो बहुत मेहनती थे और अपने धुन के पक्के ; कोई स्टारडम हावी नहीं था ; वो हमेशा मुक़्क़मल कुछ नया करने के लिए सबको प्रेरित करते थे !
–  कागज़ के फूल में एक पेड़ के नीचे बारिश में अभिनेत्री को अपना रेन कोट देते हुए जो दृश्य था वहाँ सब कुछ ठहर जाता ; गुरुदत्त का फिल्मांकन इसे जीवंत कर देता ! इसी सिनेमा से अंधेरे में बस एक प्रकाश पुंज में डायरेक्टर और अभिनेत्री के बीच संवाद और गीत “वक़्त ने किये क्या हँसी सितम” का चित्रांकन अपने आप में मनमोहक और हृदयस्पर्शी है !
– मिस्टर एंड मिसेज ५५ में प्रीतम आन मिलो गाना – जैसे प्रेयसी अपने साजन को खींच रही !

*प्यासा*

उन्होंने अपने सिनेमा में अपनी जिंदगी से प्राप्त अनुभवों को पूरी तरह दिखाने की कोशिश की है ; उनके चुने हुए गीत जैसे खुद एक कहानी को बयाँ करते थे ! हिंदी सिनेमा के ब्लैक एंड वाइट दौर की एक सिनेमा जिसे  “IMMORTAL क्लासिक” कहा जाता है “प्यासा” जिसे वो कशमकश नाम देना चाहते थे ! ये एक कवि की कहानी है उसके जीवन, सबंध, समाज में एक कला को नहीं समझ पाने का चित्रण इस सिनेमा को एक महान क्लासिक बनाता ! इसके गाने जो आपको एक नए दुनिया में ले जाते ! प्यासा का विजय ; बेरोजगार कवि अपने नज्मों को दुनिया के सामने रखना चाहते लेकिन उसे दुत्कार मिलती ! किस तरह वो छोटे चीजों को उकेरते एक दृश्य से पता चलता “टैक्सी पड़ाव पर एक आदमी कुली के लिए आवाज देता, विजय हाथ में डिग्री लिए कुछ सिक्कों के लिए उसका समान टैक्सी में रखता, बदले में वो आदमी एक खोटा सिक्का देता और कहते हुए जाता क्या जमाना देश में आ गया है पढ़े लिखे लोग कुली का काम करने लगे; व्वयस्था पर एक आघात किया इस छोटे दृश्य ने ! पुरे सिनेमा में कवि के जीवन उतार चढ़ाव का चित्रण लाजवाब है, संवेदना से भरे गीत है !

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* प्यार से चोट खाये एक कवि हृदय से निकलते गीत को सुनिए  # जाने वो कैसे लोग थे जिनके प्यार को प्यार मिला ; हमने तो जब कलियाँ मांगी काँटों का हार मिला !
* समाज रिश्तों के खोखलेपन पर चोट करती ये धुन # ये दुनिया अगर मिल जाए भी तो क्या है ?  ये बस्ती है मुर्दापरस्तों की बस्ती !
* समाज में व्याप्त शोषण और बुराई पर मन को झकझोर के रख देती ये गीत # जिन्हें नाज है हिन्द पर वो कहाँ है ?

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कितने रंग है इस ब्लैक एंड वाइट चलचित्र में .. शब्दों में नहीं ढाला जा सकता इसे !  इस सिनेमा के अंत में कवि कहता ” मैं दूर जा रहा हूँ, जहाँ से फिर दूर जाना न पड़े” !

*कागज़ के फूल*

लोग कहते है की ये फ़िल्म गुरुदत्त ने अपने जिंदगी पर बनायी; उनके अपने जीवन, पत्नी गीता दत्त और वहीदा रहमान से सबंधों के परिपेक्ष में उन्होंने कागज़ के फूल की कहानी गढ़ी । उनके दोस्तों ने ये फ़िल्म बनाने से उनको  मना किया लेकिन वो अपने धुन के पक्के थे । उन्होंने कहा ये फ़िल्म मैं अपने लिए बना रहा । भले ही ये बायोपिक न हो लेकिन उन्होंने अपने जीवन से मौत तक की पटकथा इस फ़िल्म में प्रदर्शित कर दी थी । ये फिल्म जो आज के महान क्लासिक फिल्मों में शुमार है उस समय गुरु दत्त के लिए त्रासदी ही रहीं और उन्होंने हमेशा के लिए डायरेक्शन छोड़ दिया !

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कागज़ के फूल के कुछ गाने जो आपके आत्मा में उत्तर जाते – “देखी जमाने की यारी; बिछड़े सभी बारी बारी ” ; वक़्त ने किया क्या हँसी सितम तुम रहे न तुम हम रहें न हम !

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*साहिब बीबी और ग़ुलाम*

बंगाल के पृष्टभूमि से जुड़ी ये सिनेमा भी समाज में आये बदलाव को दर्शाती, कैसे हवेली और जमींदारों की सम्पत्ति खत्म होती ! हवेली में रहने वालों लोगों की झूठी शान और हवेली के अंदर के कुछ रिश्तों को भी उजागर किया इस चलचित्र ने ! कुछ आलोचना का भी शिकार होना पड़ा गुरुदत्त को की एक औरत को शराब और किसी पराये पुरुष को हमदर्द मान के उसके साथ के पल को समाज ने सहज रूप से नहीं लिया ! आज ये आम बात हो सकती लेकिन गुरुदत्त ने उस समय आधुनिक समाज का चेहरा जब लोगों को दिखा दिया था लोगों ने इसकी आलोचना की ! ये कहानी घूमती जमींदार (रहमान), छोटी बहु(मीना कुमारी), भूतनाथ(गुरुदत्त), जाबा(वहीदा रहमान) के इर्द गिर्द.

इसका संगीत भी कर्णप्रिय था – भंवरा बड़ा नादान, साहिल के तरफ कश्ती ले चल, न जाओं सैयां चुरा के बैयाँ कसम तुम्हारी मैं रो पडूँगी, पिया ऐसा जिया में समाएं गयो रे !

गुरुदत्त गानों के चित्रण पर विशेष ध्यान देते थे और इनके संगीत चलचित्र को परिभाषित कर देते थे !

गुरुदत्त और जॉनी वॉकर

गुरुदत्त ने बहुत फिल्मों में जॉनी वॉकर को काम दिया ; और उन्होंने बस एक हास्य कलाकार की तरह उपेक्षित नहीं रखा उन्हें बल्कि उनके किरदार के लिए गीत और कहानी में भरपूर स्थान भी दिया !

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एक संगीत इसका सहज उदाहरण है ~  # जाने कहाँ मेरा जिगर गया जी ; अभी अभी यहीं था किधर गया जी ! (जॉनी वॉकर और विनीता भट्ट) ;” प्यासा में सर जो तेरा चकराए दिल डूबा जाए हास्य विनोद से भरपूर है !

Hindi Cinema’s Timeless Treasures

Guru Dutt as Actor

  • Sanjh Aur Savera (1964)
  • Suhagan (1964)
  • Bahurani (1963)
  • Bharosa (1963)
  • Sahib Bibi Aur Ghulam (1962)
  • Sautela Bhai (1962)
  • Chaudhvin Ka Chand (1960)
  • Kaagaz Ke Phool (1959)
  • 12 O’Clock (1958)
  • Pyaasa (1957)
  • & Mrs. ’55 (1955)
  • Aar Paar (1954)
  • Baaz (1953)
  • Hum Ek Hain (1946)
  • Lakha Rani (1945)
  • Chand (1944)

Guru Dutt as Producer

  • Aar Paar (1954)
  • I.D. (1956)
  • Pyaasa (1957)
  • Gauri (1957) Incomplete
  • Kaagaz Ke Phool (1959)
  • Chaudhvin Ka Chand (1960)
  • Sahib Bibi Aur Ghulam (1962)
  • Baharein Phir Bhi Aayengi (1966)

Guru Dutt as Director

  • Kaagaz Ke Phool (1959)
  • Pyaasa (1957)
  • Sailaab (1956)
  • & Mrs. ’55 (1955)
  • Aar Paar (1954)
  • Baaz (1953)
  • Jaal (1952)
  • Baazi (1951)

एक कला प्रेमी को; अँधेरे से निकलता किरदार, मद्धम रौशनी, चुप्पी, ख़ामोशी से उठते चेहरे पर उपजे भाव सहज ही सबको आकर्षित करते । गुरुदत्त के किरदारों से आप सहज ही जुड़ जाते प्यासा का विजय, मिस्टर एंड मिसेज 55 का कार्टूनिस्ट प्रीतम, या कागज़ के फूल का डायरेक्टर सुरेश सिन्हा हो सब का जीवन चरित्र आपको अपने जीवन में हो रहे संघर्षों के करीब लगता । एक वृद्ध से लेके युवा तक, संघर्ष से लेके रोमांस तक, विषाद से लेके उत्साह तक, दोस्ती से लेके परिवार तक हर जगह गुरुदत्त के सिनेमा की पहुँच है ।

अपने अवसादों और कुछ निजी जिंदगी के घुटन से इस महान कलाकार ने इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया ! कुछ इन्होने अपने चलचित्र के तरह ही अपनी जिंदगी से रुक्सत किया ! एक गाना याद आ रहा “देखी जमाने की यारी; बिछड़े सभी बारी बारी” और वो प्यासा कलाकार अपने कशमकश से निकल कर वहाँ चला गया “जहाँ से फिर दूर जाना न पड़े” !

इस किताब से मिली प्रेरणा गुरुदत्त के जीवन को समझने में – फ्लिपकार्ट पर उपलब्ध !

GuruDutt Biographies on YouTube (Guru Dutt Era Assorted by Me.)

Research, Compilation and Written By : Sujit Kumar

Mr and Mrs 55 ( B&W Era ) सिनेमास्कोप से !

Mr and Mrs 55

ब्लैक एंड वाइट सिनेमा के दौर से गुरुदत्त की एक ऐसी ही सिनेमा से रूबरू कराते है आपको ! – Mr and Mrs 55

Cast: Madhubala, Guru Dutt, Lalita Pawar, Johnny Walker, Vinita Bhatt (Yasmin), Kumkum, Tun Tun, Cuckoo

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एक साधारण सी प्रेम कहानी १९५५ में ये सिनेमा आई थी ; गुरुदत्त और मधुबाला मुख्य किरदार में थे ! कहानी कुछ इस तरह थी – गुरुदत्त (प्रीतम) एक कार्टूनिस्ट लेकिन बेरोजगार दोस्त से उधार पर नौकरी की तलाश कर रहा बंबई में ; सीता देवी शहर की जानी मानी हस्ती जो महिला संगठन से जुड़ी थी ; सीता देवी पुरुषों के खिलाफ महिलाओं को एकत्रित करती और भारत में तलाक प्रथा के लिए कोर्ट में महिलाओं की अर्जी का समर्थन कर रही थी !

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अनीता सीता देवी की भतीजी – बड़े घर में पली लड़की ; प्यार के तलाश में मस्त मौला सी रहने वाली ; अनीता के किरदार में थी मधुबाला ! इन सबके बीच प्रीतम का दोस्त जोनी वॉकर ने पुरे कहानी में हास्य की कोई कमी नहीं की !

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प्रीतम को सीता देवी एक प्रस्ताव देती झूठ की शादी करने का ढोंग और तलाक लेके अपने जिंदगी में वापस जाने का वादा लेती ; इसके बदले प्रीतम को मिलता २५० रुपया हर महीना ; पहले तो प्रीतम नहीं मानता लेकिन मधुबाला की फोटो देख वो राजी हो जाता ; लेकिन शादी और तलाक के बाद प्रीतम अनीता से प्यार करने लगता ; सीता देवी दवाब डालती की प्रीतम अनीता को छोड़ दे लेकिन प्रीतम अब अनीता को अपनी पत्नी के रूप में देखता !

एक दिन प्रीतम अनीता को अपने गाँव ले जाता वहाँ प्रीतम की भाभी से अनीता का कुछ वार्तालाप होता !

अनीता – आप इतना काम करती थक नहीं जाती !
भाभी – अपना घर गृहस्थी बोझ कैसा ! घर के काम काज में ही गृहस्थी का सुख है !
अनीता – शादी और इतने बच्चे ; औरत की आजादी खत्म हो जाती !
भाभी – जो औरत अपने बाल बच्चे को बोझ समझे वो मान कहलाने योग्य है ?
अनीता – आपके पति कभी खराब बर्ताव करते होंगे ;
भाभी – प्यार भी तो वहीँ करते !

ये सुन ; अनीता के मन में प्रीतम के लिए प्यार उमड़ जाता !

फिर सीता देवी प्रीतम को तलाक के लिए दवाब डालती ; फिर कोर्ट , कुछ जद्दोजहत और अंत में अनीता प्रीतम को एयरपोर्ट पर खोजते हुए आती की वो चला ना जाएँ ; प्रीतम नहीं जाता और एक सुखद अंत कहानी का ! लेकिन सीता देवी जो औरत को मॉडर्न बनने की हिमायत करती दिखी पटकथा ने उसे नकारत्मक छवि की महिला बना के प्रस्तुत किया !

सिनेमा के कुछ संगीत जो कर्णप्रिय लगे ;

गायक : रफ़ी, गीता दत्त, शमशाद बेगम

# जाने कहाँ मेरा जिगर गया जी ; अभी अभी यहीं था किधर गया जी ! (जॉनी वॉकर और विनीता भट्ट)

# प्रीतम आन मिलो – क्लासिकल भारतीय संगीत ; दिल को खींचता संगीत !

# मेरी दुनिया लूट रहीं थी और मैं खामोश था ; टुकड़े टुकड़े दिल के चुनता किसको इतना होश था ! (विरह और दिल को कुरेदता गीत)

मैं ये सोच कर ये उसके दर से उठा था .. (भूले बिसरे गीत)

“हकीकत” फिल्म से भूले बिसरे गीत में रफ़ी साहब ..

मैं ये सोच कर ये उसके दर से उठा था ;
की वो रोक लेगी मना लेगी मुझको ;
हवाओं में लहराता आता था दामन ;
की दामन पकड़ कर बिठा लेगी मुझको ;
कदम ऐसे अंदाज से उठ रहे थे की ;
आवाज देकर बुला लेगी मुझको ;
मगर उसने रोका ना, ना उसने मनाया ;
ना दामन ही पकड़ा ना मुझको बिठाया ;
ना आवाज ही दी ना वापस बुलाया ;
मैं आहिस्ता आहिस्ता बढ़ता ही आया ;
यहाँ तक की उससे जुदा हो गया मैं !!

“Main Yeh Soch Kar Uske Dar Se” – The greatest ever Song / Ghazal from movie Haqeeqat in 1964. The trio of Madan Mohan, Kaifi Azmi, Mohd.Rafi has given the most beautiful Ghazal of all the time. A Evergreen Gem by Md. Rafi

कब आते हो कब जाते – Gulzar Video Poetry

कब आते हो ..कब जाते हो

ना आमद की आहट .. ना जाने की टोह मिलती है !
कब आते हो ..कब जाते हो !

ईमली का ये पेड़ हवा में जब हिलता है तो,
ईटों की दीवारों पर परछाई का छीटा परता है,
और जज्ब हो जातें जैसे !

सूखी मट्टी पर कोई पानी के कतरे फ़ेंक गया हो ..
धीरे धीरे आँगन में फिर धुप सिसकती रहती है ..
बंद कमरे में कभी कभी ,
जब दिये की लौ हिल जाती है तो,
एक बड़ा सा साया मुझे घूँट घूँट पीने लगता है !

कब आते हो कब जाते हो दिन में कितनी बार तुम याद आते हो !! #Gulzar

SK Facebook Film – कुछ लम्हें

दुनिया की दुरी को तीन पग से भी बौना करता, ये सोशल नेटवर्किंग की दुनिया ! एक अलग देश जहाँ हर जाती, महाद्वीप, भाषा, रंग रूप के लोग जिंदगी के हर पल को साझा करते, विज्ञान का अनूठा चौपाल .. फेसबुक !! दस वर्ष पर आपके कुछ लम्हों को यूँ समेटे हुए फेसबुक से ये चलचित्र …

Gulzar – Ye Khel Aankhir Kisliye (ये खेल आखिर किसलिये ) : Video

About Video: Amazing Poetic Story from Gulzar ; How can we understand each other in just own belief and thought. How love can be described in words just feel the enigma of forever love in Gulzar Words.

Gulzar – Ye Khel Aankhir Kisliye

ये खेल आखिर किसलिये ..
मन नहीं उबता, कई कई बार तो खेल चुके है ये खेल हम अपनी जिंदगी में,
खेल खेला है खेलते रहे है ..नतीजा फिर वही एक जैसा , क्या बाँकी रहता है,
हासिल क्या होता है, जिंदगी भर एक दूसरे के अँधेरे में गोते खाना ही तो इश्क है ना,
आखिर किसलिये .. एक कहानी है सुनाऊं … To Be Continued …..

A Little BIT of Life – तुम्हें लिखने का इतना शौक क्योँ है ..?

A Little BIT of Life – A Heart Touching, inspiring story of Writer, who stuck between his thoughts and life circumstances. His words compel you to feel the spirit behind writing. A very nice short movie.. Watch and share..

A Little BIT of Life, HINDI SHORT FILM

Taken From Video :

तुम्हें लिखने का इतना शौक क्योँ है ..??
पूछना आसान है जवाब देना उतना ही कठिन !
मुझसे पूछते हो मेरा लिखना क्या है;
ये कुछ शब्दों की अपनी ही दुनिया है,
जहाँ हर शब्द एक बढते हुए बच्चे की तरह है ..
जमीन में बोये हुए किसी बीज की तरह है,
हर शब्द एक आवाज है ऐसी जो खामोश रहकर सोचने पर मजबूर कर दें;
भगवान साँस देता है, माँ जन्म देती है !
ये शब्द जिंदगी देते है , हर शब्द एक नशा है जो दुनिया भुला देता !
इसे तुम अपने रगो में दौरता हुआ महसूस कर सकते हो !
हर शब्द जैसे मन की आजादी, तुम अगर इन्हें छोरना भी चाहों,
ये शब्द तुम्हें नहीं छोरते ! और मुझसे पूछते मेरा लिखना क्या है;
ये कुछ शब्दों की अपनी ही दुनिया है …..

हाँ मैं पागल हूँ .. अगर पागल उसे कहते है जो अपनी मर्जी से जीना चाहता है
मरने से पहले साँस लेना का अहसास लेना चाहता है, खुद की राह बनाकर मंजिल की ओर बढना चाहता है,
मैं खुद को ढूंड रहा हूँ और जिंदगी नाम का किताब पढ़ा रहा हूँ !

Video Courtesy:  Sk Karthick

घूँघट घूँघट नैना नाचे – Poetic Song ( Sharda Sinha)

** एक टीवी साक्षात्कार में शारदा सिन्हा से कुछ पंक्तियाँ, इस गीत व कविता को सुना, और सचमुच भाव से ओत प्रोत कर्णप्रिय रचना ! माटी की खुशबू और संगीत जैसे परम्परा का वहन करती !
घूँघट घूँघट नैना नाचे, पनघट पनघट छैया रे,
लहर लहर हर नैया नाचे, नैया में खेवइया रे।
बीच गगन में बदरा नाचे बरसे मारे प्यार के,
पानी पी के धरती नाचे बिना किसी आधार के ।
डूबा सूर्य निकल आया तो मरने वाला कौन है,
रंग बिरंगे परिवर्तन से डरने वाला कौन है !
नाचू जैसे मुझे नचाते मेरे वेणु बजाया रे !
लहर लहर हर नैया नाचे, नैया में खेवइया रे।

(गोपाल सिंह नेपाली की काव्य रचना को जीवंत करती शारदा सिन्हा के स्वर !)