Poetry

A Sunday of Summer


अम्बर की ये तीखी किरणे,
धरा लगी ऊष्मा को सहने,
नदियाँ लगी उथले हो बहने !

शुष्क जमीं सब सूखा झरना,
लगा पतझर में पत्तों का गिरना !

सड़क सुनी, गलियाँ भी खाली,
इतवारी दिन लगती है सवाली !

धुल हवा के भरे थपेरे,
मन बेचैन जैसे हुए सवेरे !

तब लंबी छुट्टी गाँव बुलाती,
याद बचपन की ऐसे वो आती !

बड़े खंभों ने वृक्षों को लिला,
बड़ा तप गया ये शहरी टीला !

ग्रीष्म काल अब हमे नहीं है भाती !

Thoughts in Summer : SK

Sujit Kumar Lucky
Sujit Kumar Lucky - मेरी जन्मभूमी पतीत पावनी गंगा के पावन कछार पर अवश्थित शहर भागलपुर(बिहार ) .. अंग प्रदेश की भागीरथी से कालिंदी तट तक के सफर के बाद वर्तमान कर्मभूमि भागलपुर बिहार ! पेशे से डिजिटल मार्केटिंग प्रोफेशनल.. अपने विचारों में खोया रहने वाला एक सीधा संवेदनशील व्यक्ति हूँ. बस बहुरंगी जिन्दगी की कुछ रंगों को समेटे टूटे फूटे शब्दों में लिखता हूँ . "यादें ही यादें जुड़ती जा रही, हर रोज एक नया जिन्दगी का फलसफा, पीछे देखा तो एक कारवां सा बन गया ! : - सुजीत भारद्वाज
http://www.sujitkumar.in/