बैठे हो क्यों ख्वाब बन कर ?

खामोश ही सही, पर रहों आसपास बनकर !
बिखर जाओ भले, रह जाओ एक अहसास बनकर !
दूर जाने से किसे कौन रोके, ठहर जाओ बस कुछ याद बनकर !
रिश्तों की कुछ लकीर सी उलझी,
उभर परी तो बस एक सवाल बन कर !
रोका हाथों से बहुत हमने,
बह ही जाते जज्बात बनके !
सुनी सी जब भी परती गालियाँ,
गुजर सी जाती कोई आवाज बन कर !
गुम से हो बोझिल नींदों में ,
बैठे हो क्यों ख्वाब बन कर ?
~ सुजीत

Post Author: Sujit Kumar Lucky

Sujit Kumar Lucky - मेरी जन्मभूमी पतीत पावनी गंगा के पावन कछार पर अवश्थित शहर भागलपुर(बिहार ) .. अंग प्रदेश की भागीरथी से कालिंदी तट तक के सफर के बाद वर्तमान कर्मभूमि भागलपुर बिहार ! पेशे से डिजिटल मार्केटिंग प्रोफेशनल.. अपने विचारों में खोया रहने वाला एक सीधा संवेदनशील व्यक्ति हूँ. बस बहुरंगी जिन्दगी की कुछ रंगों को समेटे टूटे फूटे शब्दों में लिखता हूँ . "यादें ही यादें जुड़ती जा रही, हर रोज एक नया जिन्दगी का फलसफा, पीछे देखा तो एक कारवां सा बन गया ! : - सुजीत भारद्वाज

6 thoughts on “बैठे हो क्यों ख्वाब बन कर ?

    Udan Tashtari

    (April 19, 2011 - 11:56 pm)

    बहुत उम्दा..

    Shah Nawaz

    (April 20, 2011 - 2:26 am)

    बहुत ही अच्छा लिखा है लक्की….

    Shah Nawaz

    (April 20, 2011 - 2:26 am)

    मेरे ख़याल से ऊपर ‘जस्बा’ की जज़्बा होना चाहिए…

    Sunil Kumar

    (April 20, 2011 - 5:16 pm)

    खामोश ही सही, पर रहों आसपास बनकर !
    बिखर जाओ भले, रह जाओ एक अहसास बनकर
    खुबसूरत अहसास बधाई ….

    KANG Gurpreet

    (April 21, 2011 - 1:29 pm)

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    If you get time, have a look at my blogs:

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    shweta

    (January 6, 2013 - 8:13 am)

    beautiful lines sir……

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