बैठे हो क्यों ख्वाब बन कर ?

खामोश ही सही, पर रहों आसपास बनकर !
बिखर जाओ भले, रह जाओ एक अहसास बनकर !
दूर जाने से किसे कौन रोके, ठहर जाओ बस कुछ याद बनकर !
रिश्तों की कुछ लकीर सी उलझी,
उभर परी तो बस एक सवाल बन कर !
रोका हाथों से बहुत हमने,
बह ही जाते जज्बात बनके !
सुनी सी जब भी परती गालियाँ,
गुजर सी जाती कोई आवाज बन कर !
गुम से हो बोझिल नींदों में ,
बैठे हो क्यों ख्वाब बन कर ?
~ सुजीत

6 thoughts on “बैठे हो क्यों ख्वाब बन कर ?”

  1. खामोश ही सही, पर रहों आसपास बनकर !
    बिखर जाओ भले, रह जाओ एक अहसास बनकर
    खुबसूरत अहसास बधाई ….

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