एक अनजान सफ़र


भागती ऊहापोह जिन्दगी में
क्या खोने पाने की चाहत है,

बस उबते थकते मन को बहलाते

चले जा रहे एक अनजान सफ़र पर !

क्या पाउगा या क्या खो दूगा,
गुमनाम चाहत है एक हसरत है,
सपनो की बादल की एक बूंद ही सही
बस चले जा रहे एक अंजन सफ़र पर


रचना : सुजीत कुमार लक्की


3 thoughts on “एक अनजान सफ़र

  1. सुलभ [Sulabh]

    क्या पाउगा या क्या खो दूगा,
    गुमनाम चाहत है एक हसरत है.

    अच्छा लगा. आगे लिखते रहें.

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