एक जहाँ फिर छुटा – #Sk Triveni Poetry

triveni

इतनी दूर सफ़र पर हो आये साथ चलते,
जब एक अजनबी से जाना अपना नाता,

फिर क्यों एक लम्हा हमसे इस तरह रुठा ।1

निभाते रह गये हर वो रिश्ता,
जिसमे हम थे ही नहीं कभी,

फिर क्यों एक जहाँ हमसे इस तरह छुटा ।2

जाने किस भ्रम का साया सा था घना,
इस कद्र भीड़ में खो जाना खुद को कहाँ हूँ मैं,

जब उलझनों में मुझसे मेरा सब्र टुटा ।3

तेरी इबादत में खुद को पा गया ए खुदा,
अब तू मत आना एक नई इबादत ये भी,

अब जैसी है ये दुनिया रास आ गयी है हमें ।4

 

About Poem : [ गुलज़ार साहब के नज्मों में जिंदगी के शब्द होते, त्रिवेणी इक विधा है जिसे गुलजार साहब ने इख़्तियार किया है, इस तरह की कविताओं में तीन पंक्तियाँ होती; दो अपने आप में मुक्कमल होती अपने मायनों में, लेकिन तीसरी पंक्ति इस इक नया अर्थ देती ! Triveni is a form of Hindi/Urdu poetry initiated by the poet Gulzar. Unlike sher, a triveni consists of three “hemistichs” (misras). The first two are complete in themselves but the addition of the third misra gives a new dimension. ]

इक कोशिश की है कुछ त्रिवेणी की तरह कविता लिखने की ~ सुजीत

I am just a random writer, insane with words & Thoughts, just inspired with Gulzar sahab poetry, tried to write my first “Triveni” Style Poem ~ Sujit