परछाइयाँ – Shadow of a Soul

shadowपरछाई सी थी साथ साथ चलता मालूम होता था ;
जैसे एकपल हाथ छू गया होगा तेज क़दमों में ;
तूने समझा उसकी साजिश सजा में हाथ छुड़ा लिया ;
बस वहीँ ठिठक कर रुक गया था वो आगे नही गया ;
सर पर धुप थी खड़ी परछाई उसकी पैरों में आ पड़ी ;
पर वो दूर जाते देखता रहा, जाता साया लम्बा दूर होता रहा !

अब शाम थी सारी परछाइयाँ सिमट कर नजाने;
कहाँ खो गयी थी, भीड़ थी पसरी कितने चेहरों की ;
कोई साया नही था अब था तो जीता जागता हर सख्स ;
वो सोचता रहा परछाईं जो साथ साथ चलती रही उम्र भर ;
कहाँ किस कदर खो गयी उस दूर ढलते आसमानों के पार;
जाती परछाई कह रही थी उसे आभाषी दुनिया का इंसान !

आभाषी दुनिया परछाईयों की जो ना बोलती है ,
जो ना कभी सुनती है जो ना कभी समझती ;
साथ चलने वाली परछाइयाँ जिसे छुआ नहीं जा सकता ;
हाथ पकड़ कर उन सायों का दुर जाया नहीं जा सकता ;
फिर कैसे उस दिन उन सायों ने दामन छुड़ा लिया ;
शायद वो परछाइयाँ कहती रही कहती रही ;
आभाषी दुनिया के इंसानो में जीवन नहीं होता !

#SK

3 thoughts on “परछाइयाँ – Shadow of a Soul

  1. yogi saraswat

    अब शाम थी सारी परछाइयाँ सिमट कर नजाने;
    कहाँ खो गयी थी, भीड़ थी पसरी कितने चेहरों की ;
    कोई साया नही था अब था तो जीता जागता हर सख्स ;
    वो सोचता रहा परछाईं जो साथ साथ चलती रही उम्र भर ;
    कहाँ किस कदर खो गयी उस दूर ढलते आसमानों के पार;
    जाती परछाई कह रही थी उसे आभाषी दुनिया का इंसान !
    ​बहुत खूबसूरत शब्द

    Reply
  2. shreya

    The poem is just awsome…i love to read poems and i really appreciate your one as well…keep posting with lots more of such with such nice poems.

    Reply

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *