hindi poem on selfishness

खुदगर्ज़ ….

कितना खुदगर्ज़ दिन है
चुपचाप से रोज बीत जाता
न शाम से कुछ कहता,
और रात तो कबसे खामोश सी है ।

इन तीनों का कुछ झगड़ा सा है,
कोई किसी से नहीं मिलता,
बस उम्र गुजारने का हुनर सीखा है सबने,
कबसे ही अलग अलग जिये जा रहे ।

कुछ तुमने भी तो इनसे ही सीखा होगा,
या मैंने भी इनके जैसा जीना,
मैं दिन दिन तुम रात रात सी,
दो छोर हो जैसे,
कोई ढलता कोई उगता,
कोई शाम भी नहीं मिलाती इनको,
कितने खुदगर्ज़ हो गये है हमदोनों,
इस दिन रात की तरह ।

#SK

Post Author: Sujit Kumar Lucky

Sujit Kumar Lucky - मेरी जन्मभूमी पतीत पावनी गंगा के पावन कछार पर अवश्थित शहर भागलपुर(बिहार ) .. अंग प्रदेश की भागीरथी से कालिंदी तट तक के सफर के बाद वर्तमान कर्मभूमि भागलपुर बिहार ! पेशे से डिजिटल मार्केटिंग प्रोफेशनल.. अपने विचारों में खोया रहने वाला एक सीधा संवेदनशील व्यक्ति हूँ. बस बहुरंगी जिन्दगी की कुछ रंगों को समेटे टूटे फूटे शब्दों में लिखता हूँ . "यादें ही यादें जुड़ती जा रही, हर रोज एक नया जिन्दगी का फलसफा, पीछे देखा तो एक कारवां सा बन गया ! : - सुजीत भारद्वाज