hindi poem on selfishness

खुदगर्ज़ ….

कितना खुदगर्ज़ दिन है
चुपचाप से रोज बीत जाता
न शाम से कुछ कहता,
और रात तो कबसे खामोश सी है ।

इन तीनों का कुछ झगड़ा सा है,
कोई किसी से नहीं मिलता,
बस उम्र गुजारने का हुनर सीखा है सबने,
कबसे ही अलग अलग जिये जा रहे ।

कुछ तुमने भी तो इनसे ही सीखा होगा,
या मैंने भी इनके जैसा जीना,
मैं दिन दिन तुम रात रात सी,
दो छोर हो जैसे,
कोई ढलता कोई उगता,
कोई शाम भी नहीं मिलाती इनको,
कितने खुदगर्ज़ हो गये है हमदोनों,
इस दिन रात की तरह ।

#SK

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