new love hindi poem

इश्क़ ही है ..

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वो जो रातों को अधजगा सा रखता,
अजनबी संग देखो सब भेद है कहता,
यूँ ही मन ही मन कुछ गुनगुनाता है रहता !

ये जो कुछ कुछ अपना सा लगने लगा है,
ये देखो कौन अब कुछ नया चुनने लगा है,
खुद से मन जो कुछ अब कहने लगा है !

हाथों की लकीरों का ये खेल सा लगता,
या बरसों का छुपा कुछ भेद सा लगता,
या रिश्तों की नई डोर का संयोग सा लगता !

वो जो रातों को जो अधजगा सा रखता,
शायद आधा अधूरा सा सही इश्क़ ही है !

#SK

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