ओ कातिल हँसी के – Enemies of Humanity (Terror in Iraq)

From Few Days On Iraq Issues, I went  through several news & video clips, really very disgraceful for human beings, how can they surpass the human feelings on name of religion and communities, Imagine How touching Killing of innocents.. They are just enemies of humanity.  Some thoughts over it …
terror-violence

ना सुनामी ना तूफानों ने,
इंसानों ने ही लील ली ये दुनिया ।

ना मसीहा ने बोला,
पहन रकीबों का चोला
काफ़िर हो तुम सब ..
लगाया जो तुमने ये खूनों का मेला ।

किस मजहब के हो सिपाही,
रोती बिलखती जमीं ये तुम्हारी ।

है गलियां जो सुनी,
धुंधली चमन पर,
अब छीटें है पसरी,
काली रातों में बस चीखें तुम्हारी ।

कल तक थे वो भाई,
अब लाशें ही लाशे,
कहाँ खो गयी वो,
ईदें तुम्हारी ।

सम्भालों अमन को,
बचालों वतन को ।

सजदे में बचपन,
कहता वो हरदम,
ऐसी हो दुनिया तो,
छीन लो अब साँसे हमारी ।

ओ कातिल हँसी के,
तुमने क्या लगाया,
ये खूनों का मेला ।

: – सुजीत 

 

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