Poetry

Again Untold – Night & Pen

असमंजस में था मन,
खुले आसमाँ को देख,
आज उसकी चाहत थी,
टूटे कोई तारा फिर …

वो मांगे बैठे कुछ दुआयें !
शिकायत नहीं किसी से है कोई,
फकत खुद के फैसले, खुद से बातें..
खुद के ही सवाल है ..इर्द गिर्द पसरे!

ना कुछ जवाब देते, ना कुछ बयाँ करते;
जाने भी नहीं देता ये किसी ओर,
ये मन जैसे टटोल रहा, या जोड़ रहा कितने शब्दों को,
जो कहना है इसको उस पल, जब इस राहगीर का कोई बसेरा ना होगा;
चलना उसे उस दिन भी है .. नातों के खेल में उलझा हुआ है मन !

अब कुछ भी बचपना सा नहीं है,
जो कुछ माँगे या रूठे किसी कोने में जाके,
इस रात में भी काफी चकाचौंध है सब दिख जाने को !

उस जहाँ में सुनता जाता तेरी हँसी, और खिले से चेहरे,
कदमों को में तो यूँ ही गवां चूका उस और जाने की !
क्या हुआ जो फिर एक बात से सन्नाटा सा हुआ,
ये रात भी तो खूब साथ देता है अक्सर मेरा !!

In Night & Pen : – SK

Sujit Kumar Lucky
Sujit Kumar Lucky - मेरी जन्मभूमी पतीत पावनी गंगा के पावन कछार पर अवश्थित शहर भागलपुर(बिहार ) .. अंग प्रदेश की भागीरथी से कालिंदी तट तक के सफर के बाद वर्तमान कर्मभूमि भागलपुर बिहार ! पेशे से डिजिटल मार्केटिंग प्रोफेशनल.. अपने विचारों में खोया रहने वाला एक सीधा संवेदनशील व्यक्ति हूँ. बस बहुरंगी जिन्दगी की कुछ रंगों को समेटे टूटे फूटे शब्दों में लिखता हूँ . "यादें ही यादें जुड़ती जा रही, हर रोज एक नया जिन्दगी का फलसफा, पीछे देखा तो एक कारवां सा बन गया ! : - सुजीत भारद्वाज
http://www.sujitkumar.in/