सूरज ने दो जगह से उगना शुरु कर दिया …

थोरा ढला ढला,झुका झुका सुबह था आज का,
सूरज भी था कहीं खोया था आज मेरी तरह,
ठण्ड हवा की थोरी कंप कपी, छु रही थी जैसे ;

माँ ने अभी हाथ से छु के कह रही हो उठने को
और रोज की तरह वो जा रही फूलों के थाल लिए मंदिर की ओर,

आँगन के अरहुल की लाली , द्वार पर लगे बेली की ताजगी
बस रही मन में ..आज भी तरो तजा जैसे ..

मैं तो आज भी उठता हूँ उस सुबह में ही ,
पर सूरज ने दो जगह से उगना शुरु कर दिया !

रचनासुजीत कुमार लक्की