Poetry

सूरज ने दो जगह से उगना शुरु कर दिया …

थोरा ढला ढला,झुका झुका सुबह था आज का,
सूरज भी था कहीं खोया था आज मेरी तरह,
ठण्ड हवा की थोरी कंप कपी, छु रही थी जैसे ;

माँ ने अभी हाथ से छु के कह रही हो उठने को
और रोज की तरह वो जा रही फूलों के थाल लिए मंदिर की ओर,

आँगन के अरहुल की लाली , द्वार पर लगे बेली की ताजगी
बस रही मन में ..आज भी तरो तजा जैसे ..

मैं तो आज भी उठता हूँ उस सुबह में ही ,
पर सूरज ने दो जगह से उगना शुरु कर दिया !

रचनासुजीत कुमार लक्की
Sujit Kumar Lucky
Sujit Kumar Lucky - मेरी जन्मभूमी पतीत पावनी गंगा के पावन कछार पर अवश्थित शहर भागलपुर(बिहार ) .. अंग प्रदेश की भागीरथी से कालिंदी तट तक के सफर के बाद वर्तमान कर्मभूमि भागलपुर बिहार ! पेशे से डिजिटल मार्केटिंग प्रोफेशनल.. अपने विचारों में खोया रहने वाला एक सीधा संवेदनशील व्यक्ति हूँ. बस बहुरंगी जिन्दगी की कुछ रंगों को समेटे टूटे फूटे शब्दों में लिखता हूँ . "यादें ही यादें जुड़ती जा रही, हर रोज एक नया जिन्दगी का फलसफा, पीछे देखा तो एक कारवां सा बन गया ! : - सुजीत भारद्वाज
http://www.sujitkumar.in/