शब्दो के दरमियाँ फासले बहुत थे – A Random Thoughts

शब्दो के दरमियाँ फासले बहुत थे ,
पर कुछ बातें तो निकली जुबान से !

अनसुनी न थी बातें मेरी ,
मगर गुस्ताख़ी का नाम दे गये !

यूँ तो फिदरत ही नही समझाने की,
कहते कहते बस एक अंजाम दे गए !


रचना
:
सुजीत कुमार लक्की



4 thoughts on “शब्दो के दरमियाँ फासले बहुत थे – A Random Thoughts

  1. Kulwant Happy

    अच्छा है संवाद अच्छा..टेम्पलेट अच्छा है, पिक्चर अच्छा है।

    ” वो पास से गुजरे पलट क्र भी नही देखा,
    हम कैसे मन ले की वो दूर जाके रोये …”

    ये भी बेहद अच्छा है।

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