लाल स्याही … A Treasure !



क्योँ अलग विजाती से बैठे,
आँगन के उस पार अकेले,
ढोल नगारे कानों से टकरा कर,
वहीँ निस्तब्ध से हो चले,
गुमसुम से बस तकते उस भीड़ को,
हिस्सा जो नहीं उस उत्सव का मैं !

मैं जानती रीती रिवाजों से बने,
इन कोरे चित्रों को, रंग थे जिनमे अनेकों,
बस वक्त के हाथों से फिसल गयी लाल स्याही,
अब अँधेरा अँधेरा ही है हर तरफ,
होती जब सुबह ये रंगहीन क्योँ है सबकुछ,
यादों को टटोलते..झुंझलाते मन को,
हर तरफ बहलाती चौकठों को करती आर पार !

जैसे रुक गया हो जीवन चक्र मेरा,
सरसराते पुराने पत्ते ढेर से बिखरे,
कह रहे खामोश हो के, गया बसंत,
ना लौट के आने को फिर …
डाल टहनी सब खंडर !

हाथ फीके, गहने छुटे,
यादें अब मेरे नीर पोछे,
आँखे धुँधली कदम लरखराई,
बस वक्त के हाथों से फिसल गयी लाल स्याही !

Post Author: Sujit Kumar Lucky

Sujit Kumar Lucky - मेरी जन्मभूमी पतीत पावनी गंगा के पावन कछार पर अवश्थित शहर भागलपुर(बिहार ) .. अंग प्रदेश की भागीरथी से कालिंदी तट तक के सफर के बाद वर्तमान कर्मभूमि भागलपुर बिहार ! पेशे से डिजिटल मार्केटिंग प्रोफेशनल.. अपने विचारों में खोया रहने वाला एक सीधा संवेदनशील व्यक्ति हूँ. बस बहुरंगी जिन्दगी की कुछ रंगों को समेटे टूटे फूटे शब्दों में लिखता हूँ . "यादें ही यादें जुड़ती जा रही, हर रोज एक नया जिन्दगी का फलसफा, पीछे देखा तो एक कारवां सा बन गया ! : - सुजीत भारद्वाज