लाल स्याही … A Treasure !

क्योँ अलग विजाती से बैठे,आँगन के उस पार अकेले,ढोल नगारे कानों से टकरा कर,वहीँ निस्तब्ध से हो चले,गुमसुम से बस तकते उस भीड़ को,हिस्सा जो नहीं उस उत्सव का मैं …

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