मेरे हमसफर

यूँ राह में, डगर में, छोड़ के चले जो हमसफर ..
मगरूर बन, आवाज न देंगे, मेरे हमसफर !
गुजरे पल बीते, जैसे बीते गये हर पहर ..
गुम से हुए है गलियों में, ये कैसा शहर !
उठ के फिर से लौट जाती, किनारे से हर लहर..
बेरुखी के दामन ने थामा ऐसे, की फेर ली हर नजर !
कभी जो सोचे, होगी खबर ए हमसफर ..
बीते रात में,यादों को छोड़कर, भूलेगे इस कदर !
कुछ नशा सा हुआ, बस पी गये हर जहर
चलते जा रहे मंजिल पाने हम बन के एक सिफर !
(सुजीत )
** सिफर – शून्य

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