मन – An Inner Inner Conscience


सुनी सी ये शाम है अब की,
दिन दुपहरी लगती वैशाखी !

कुछ रंग फीके लगते इस जग के,
ये मन अपना किस तलाश में भागे,

कभी कोसता नाकामी पल को,
लगा सपनों की पंख उड़ने को !

ख्वाब सजाता साथ हो कोई,
ख़ामोशी में सुना बन कोई !

दीखते बदले रंग चेहरों की,
एक जरिया ढूंढे खो जाने की !

मन का पंछी डरता साथ ना छुटे,
डाली पत्ती के बाँहों की !

कई रात दिन इस कदर बीती,
बीती कई शाम और सुबह !

आस लगाये ना जाने किस पल की,
आने वाले किस अनजाने पल की !

क्यूँ ठहरता मन अनजानी राहों को पाकर,
क्यूँ सुनाता आह तू अपनी बैरी लोगों को पाकर !

Thoughts : # Sujit Kumar 

Post Author: Sujit Kumar Lucky

Sujit Kumar Lucky - मेरी जन्मभूमी पतीत पावनी गंगा के पावन कछार पर अवश्थित शहर भागलपुर(बिहार ) .. अंग प्रदेश की भागीरथी से कालिंदी तट तक के सफर के बाद वर्तमान कर्मभूमि भागलपुर बिहार ! पेशे से डिजिटल मार्केटिंग प्रोफेशनल.. अपने विचारों में खोया रहने वाला एक सीधा संवेदनशील व्यक्ति हूँ. बस बहुरंगी जिन्दगी की कुछ रंगों को समेटे टूटे फूटे शब्दों में लिखता हूँ . "यादें ही यादें जुड़ती जा रही, हर रोज एक नया जिन्दगी का फलसफा, पीछे देखा तो एक कारवां सा बन गया ! : - सुजीत भारद्वाज

1 thought on “मन – An Inner Inner Conscience

    Sonam Verma

    (September 16, 2012 - 11:05 am)

    Unse Milkar Rab Ki Ibadat Bhool Gye
    Unki Adaye Dekh K Apni Aadat Bhool Gye
    Ye Kaisa Jadu Kr Diya H Unhone
    Unko Chah Kr Duniya Ki Chahat Bhool Gye

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