बिखर सा क्यूँ गया !


ख्वाब है ..जिसको सजाने की चाहत,
या झुंझलाहट है इस तोड़ देने की !

चल ही दिया दो चार कदम तो क्या,
बीता ही कुछ पल साथ तो क्या !

सब कहके लौट गये मायूसी से,
अनजान हूँ में, हर बातों से अब !

ये वक्त जो बिना दुआओं से मिला,
माँगा इसे तो बिखर सा क्यूँ गया !

हार तो हर पल की ही है,
दाव ही रूठे मुक़द्दरों पर था !

अहसास शब्दों में रोज बाँट देता,
अब फिर लब्ज कहाँ से ले आऊ !

चुप सा हूँ पर गुमनाम नहीं,
बिखेरा है खुद को इस तरह,

हर पल,
समेटेंगे सब खुशियों के खातिर !

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