चौथे पहर की अधूरी बातें


कुछ अधूरी सी लगती है बात,
देखता हूँ रात में लिपटी,
चाँद की उस सूरत को,
जो आज अधूरा ही आया था…

सन्नाटे छूती जाती चुपके से,
बावरे से बयार उठते है,
और छु जाते है हाथों को,
और रह जाती चौथे पहर की अधूरी बातें,
अब अधूरा चाँद भी खो जाता,
धुँधली रातों के तले अधूरा मन भी सो जाता !

नयी सुबह की अपनी उम्मीदे ..अपने फलसफे ..
मन भटकता कभी यहाँ ..कभी वहाँ !

सुजीत 

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