क्या गुनाह है .. ?

है रात मुफलिसी की,
ताक पर लगा नींदों को,
और लगा चैन के हर कोने,
चाहत सुबहों पर लगाना !

क्या गुनाह है .. ?

माना नसीबों पर नहीं इख्तियार,
और उम्मीदों के कितने बोझ तले,
एक छोटा कोना सजाना,
रंजो गम में थोरा मुस्कुराना !

क्या गुनाह है .. ?

सजाये ख्वाब ना पूछा तुझसे,
तो अधुरा ही सही,
कुछ चाहत जताना,
यादों से थोरा आंखें भिगोना !

क्या गुनाह है .. ?

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