एक रात शहर की – Devils of Dark Night …!

जब रात तमस बड़ी गहरी थी,
सहमी सी और सुनी थी !

घना अँधेरा धरा पर आता,
शहर घना जंगल बन जाता !

मद में विचरते कुंजर वन में,
विषधर ब्याल रेंगते राहों में !

दनुज सीमा के पार गया,
कुहुकिनी का स्वर भी हार गया !

विवश ईश तुम चुपचाप रहे,
अब मानव से फिर क्या आस रहे !

खग तो पंख विहीन हुआ,
हर मानवता को लील गया !

कुछ रंग देख रियासत का,
उबला खेल सियासत का !

पल विवश वेदना व्यथा भरी,
क्योँ को क्या विशलेषण की परी,

कुछ नैतिकता का विचार करो,
इस मानवता का उपचार करो !

** कुंजर = हाथी ; ब्याल = साँप ; कुहुकिनी = कोयल

Lines Suppressed Of Current Circumstances

# Sujit Kumar