प्रेम …

Loveमैं उससे लड़ता हूँ,
की थोड़ी सी ख़ामोशी तो हो,
तुझे सोच सकूँ किसी नज्म की तरह,
और तुझसे कहूँ तू खूबसूरत है शब्दों सी !

अल्लहड़ जैसे हरदम बोलना,
जैसे हवा आयी हो खिड़की से
और मेज पर से सारे पर्चे उड़ा गयी !

हरदम जिद और जिरह की बातें,
जैसे कोई शरारती बच्चा हो,
माँ की हर बातें दुहरा रहा हो !

नकारना प्यार की बातें,
और हाथ छूने पर झिरक देना,
जैसे लाज से नहायी हुई स्त्री,
कुछ दूर जाके खड़ी हो गयी !

ऐसे कभी देखा नहीं तुम्हें संगीन होते,
हाँ कभी कभार पूछते हो प्रेम क्या है ?

#SK

4 thoughts on “प्रेम …”

Comments are closed.