Poetry

हाथों में गुब्बारे थे रंगीले !

कुछ यूँ हुआ …


हाथों में गुब्बारे थे रंगीले सबके,
और कुछ छुपा रखा था खंजर जैसा !
कदम जब जब बढ़े थे हमारे ,
राह क्यों बन गया था गहरे कुँए जैसा ?
कुछ था ऐसा …
महकते ख्वाब में सज गयी थी कुछ हँसी सी,
जैसे टूटे नशे से भाग निकली भीड़ में परछाई सी,
चुप से थे भीड़ में हर एक से हजारों चेहरे !
कशमकश मन की …
हर राह है तेरी, हर रात अब तेरी,
दर्द से तरप जा, या जल जा हर आग में तू,
ये शोर तुने खुद उठाया है, ये आग तुने खुद लगाया है,
चल राह अपनी इस तरह …
बटोर ले हर पत्ते बेरुखी के, जला ले हर बात उसमे अपनी,
झाकना नही उस कुएँ में दुबारा, ये आवाजे बहुत डरावनी है,
फिर मत देखना पीछे मुड़ के कभी, हर तरफ इंसान ही इंसान नजर आएंगे !
रचना : सुजीत
Sujit Kumar Lucky

Sujit Kumar Lucky – मेरी जन्मभूमी पतीत पावनी गंगा के पावन कछार पर अवश्थित शहर भागलपुर(बिहार ) .. अंग प्रदेश की भागीरथी से कालिंदी तट तक के सफर के बाद वर्तमान कर्मभूमि भागलपुर बिहार ! पेशे से डिजिटल मार्केटिंग प्रोफेशनल.. अपने विचारों में खोया रहने वाला एक सीधा संवेदनशील व्यक्ति हूँ. बस बहुरंगी जिन्दगी की कुछ रंगों को समेटे टूटे फूटे शब्दों में लिखता हूँ . “यादें ही यादें जुड़ती जा रही, हर रोज एक नया जिन्दगी का फलसफा, पीछे देखा तो एक कारवां सा बन गया ! : – सुजीत भारद्वाज

http://www.sujitkumar.in/

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