सब बिखरा सा ..More Than A Poem

Scattered Life Hindi Poem

सब बिखरा सा ..
क्या क्या समेटू इन दो हाथों मे ?

वो परेशां थे..
पर उनकी बड़ी ही चाहत थी,हमे आजमाने की !

खामोश हूँ खरा ..
देख रहा लहरों के उछालों को !

अपने हाथों को दूर ही रखो ..
ठोकरों से गिर कर खुद ही उठूँगा मैं , और तब देखेगा ये आसमां !

रचना : सुजीत कुमार लक्की

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