शब्द कोरे हो चले है ..

शब्द कोरे हो चले है ..
कुछ फासला बड़ा है ..
कोई जो बढ़ चला है ..
जो रात रहता था साथ मेरे ..
अब वो भी सो चला है..
रास्ते मुझपर हंस पड़े है ..
अब कोई पगडंडियों पर जो चल परा है ..
अपनी ही परछाई ओझल हो गयी है ..
ख़ामोशी का वादा टूटता चला जा रहा है ,
ख्वाबे आँखे लगने की राह तकता है ..
वो भी सुबह् जी भर के बिखरता चला जा रहा है ..
सोख लिया है चेहरे के सुर्ख रंग इस शीत की उमस ने ..
बातें उल्फतों के जैसे सुख गए है स्याह इन शब्दों के ..
शब्द कोरे हो चले है ..

रचना : सुजीत कुमार लक्की

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