शब्द कोरे हो चले है ..

शब्द कोरे हो चले है ..
कुछ फासला बड़ा है ..
कोई जो बढ़ चला है ..
जो रात रहता था साथ मेरे ..
अब वो भी सो चला है..
रास्ते मुझपर हंस पड़े है ..
अब कोई पगडंडियों पर जो चल परा है ..
अपनी ही परछाई ओझल हो गयी है ..
ख़ामोशी का वादा टूटता चला जा रहा है ,
ख्वाबे आँखे लगने की राह तकता है ..
वो भी सुबह् जी भर के बिखरता चला जा रहा है ..
सोख लिया है चेहरे के सुर्ख रंग इस शीत की उमस ने ..
बातें उल्फतों के जैसे सुख गए है स्याह इन शब्दों के ..
शब्द कोरे हो चले है ..

रचना : सुजीत कुमार लक्की

Post Author: Sujit Kumar Lucky

Sujit Kumar Lucky - मेरी जन्मभूमी पतीत पावनी गंगा के पावन कछार पर अवश्थित शहर भागलपुर(बिहार ) .. अंग प्रदेश की भागीरथी से कालिंदी तट तक के सफर के बाद वर्तमान कर्मभूमि भागलपुर बिहार ! पेशे से डिजिटल मार्केटिंग प्रोफेशनल.. अपने विचारों में खोया रहने वाला एक सीधा संवेदनशील व्यक्ति हूँ. बस बहुरंगी जिन्दगी की कुछ रंगों को समेटे टूटे फूटे शब्दों में लिखता हूँ . "यादें ही यादें जुड़ती जा रही, हर रोज एक नया जिन्दगी का फलसफा, पीछे देखा तो एक कारवां सा बन गया ! : - सुजीत भारद्वाज

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