Poetry

वैसाखी दुपहरी !

पतझरों से उजरे उजरे दिन लगते ,
दुपहरी है अब लगती विकल सी !
वैसाख के इस रूखे दिन तले,
कभी बचपन में सोचा करते थे !
और चुपके आहिस्ता से देखते थे,
माँ की आंखे कब झपके थोरी नींद में !
हम भाग चले सखा संग किसी नदिया की ओर !
अबकी वैसाखी दुपहरी , जाये अब किस ओर ??
रचना : सुजीत
Sujit Kumar Lucky

Sujit Kumar Lucky – मेरी जन्मभूमी पतीत पावनी गंगा के पावन कछार पर अवश्थित शहर भागलपुर(बिहार ) .. अंग प्रदेश की भागीरथी से कालिंदी तट तक के सफर के बाद वर्तमान कर्मभूमि भागलपुर बिहार ! पेशे से डिजिटल मार्केटिंग प्रोफेशनल.. अपने विचारों में खोया रहने वाला एक सीधा संवेदनशील व्यक्ति हूँ. बस बहुरंगी जिन्दगी की कुछ रंगों को समेटे टूटे फूटे शब्दों में लिखता हूँ . “यादें ही यादें जुड़ती जा रही, हर रोज एक नया जिन्दगी का फलसफा, पीछे देखा तो एक कारवां सा बन गया ! : – सुजीत भारद्वाज

http://www.sujitkumar.in/

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