ए जिंदगी तुझे कुछ ऐसा ही समझा !

किन सपनों को तलाशे,
जिसे अधखुले आँखों ने कभी आने ही ना दिया !
या जिन्हें नींद के सौतेलेपन ने,
आने से पहले तोड़ दिया !
वक्त की उड़ानो ने पंख लगा दिए,
और आसमां ही छीन लिया !
कभी रास्तों में उलझा,
कभी मंजिलों से सहमा !
कहीं जिक्र किया !
कभी फ़िक्र क्या !
खुद से मशरूफ हो इतना,
अब तो हर वादों से गुजरा !
चुप सा हुआ तो,
बातों में उलझा !
अकेला चला तो,
रिश्तों में उलझा !
हूँ पथिक सुनसान राहों का,
ना रुका ना थका,
ए जिंदगी तुझे कुछ ऐसा ही समझा !
Sujit Kumar

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